भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2062, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2062

यतयो भिक्षवश्चात्र बभूवुः पर्यवस्थिताः ॥ ७ ॥ उन महात्माके यज्ञमें अग्निके समान तेजस्वी होता थे। जिनमें फल, मूलका आहार करनेवाले, अश्मकुट्ट^१, मरीचिप^२, परिपृष्टिक^३, वैघसिक^४ और प्रसंख्याने^५ आदि अनेक प्रकारके यति एवं भिक्षु उपस्थित थे ॥ ६-७ ॥ सर्वे प्रत्यक्षधर्माणो जितक्रोधा जितेन्द्रियाः । दमे स्थिताश्च सर्वे ते हिंसादम्भविवर्जिताः ॥ ८ ॥ वृत्ते शुद्धे स्थिता नित्यमिन्द्रियैश्चाप्यबाधिताः । उपातिष्ठन्त तं यज्ञं यजन्तस्ते महर्षयः ॥ ९ ॥ वे सब-के-सब प्रत्यक्ष धर्मका पालन करनेवाले, क्रोध-विजयी, जितेन्द्रिय, मनोनिग्रहपरायण, हिंसा और दम्भसे रहित तथा सदा शुद्ध सदाचारमें स्थित रहनेवाले थे। उन्हें किसी भी इन्द्रियके द्वारा कभी बाधा नहीं पहुँचती थी। ऐसे-ऐसे महर्षि वह यज्ञ करानेके लिये वहाँ उपस्थित थे ॥ ८-९ ॥ यथाशक्त्या भगवता तदन्नं समुपार्जितम् । तस्मिन् सत्रे तु यद् वृत्तं यद् योग्यं च तदाभवत् ॥ १० ॥ भगवान् अगस्त्य मुनिने उस यज्ञके लिये यथाशक्ति विशुद्ध अन्नका संग्रह किया था। उस समय उस यज्ञमें वही हुआ, जो उसके योग्य था ॥ १० ॥ तथा ह्यनेकैर्मुनिभिर्महान्तः क्रतवः कृताः । एवंविधे त्वगस्त्यस्य वर्तमाने तथाध्वरे । न ववर्ष सहस्राक्षस्तदा भरतसत्तम ॥ ११ ॥ उनके सिवा और भी अनेक मुनियोंने बड़े-बड़े यज्ञ किये थे। भरतश्रेष्ठ! महर्षि अगस्त्यका ऐसा यज्ञ जब चालू हो गया, तब देवराज इन्द्रने वहाँ वर्षा बंद कर दी ॥ ११ ॥ ततः कर्मान्तरे राजन्नगस्त्यस्य महात्मनः । कथेयमभिनिर्वृत्ता मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ १२ ॥ राजन्! तब यज्ञकर्मके बीचमें अवकाश मिलनेपर जब विशुद्ध अन्तःकरणवाले मुनि एक-दूसरेसे मिलकर एक स्थानपर बैठे, तब उनमें महात्मा अगस्त्यजीके सम्बन्धमें इस प्रकार चर्चा होने लगी— ॥ १२ ॥ अगस्त्यो यजमानोऽसौ ददात्यन्नं विमत्सरः । न च वर्षति पर्जन्यः कथमन्नं भविष्यति ॥ १३ ॥ 'महर्षियो! सुप्रसिद्ध अगस्त्य मुनि हमारे यजमान हैं। वे ईर्ष्यारहित हो श्रद्धापूर्वक सबको अन्न देते हैं। परंतु इधर मेघ जलकी वर्षा नहीं कर रहा है। तब भविष्यमें अन्न कैसे पैदा होगा? ॥ १३ ॥ सत्रं चेदं महत् विप्रा मुनेर्द्वादशवार्षिकम् । न वर्षिष्यति देवश्च वर्षाण्येतानि द्वादश ॥ १४ ॥