भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2054, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2054

इसी उद्देश्यसे मैं बड़े हर्ष और उत्साहके साथ बारंबार अनेकानेक तपोवनों और यज्ञस्थलोंमें जाया-आया करता हूँ। परम बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्ठिरके इस यज्ञका बड़ा भारी शोर सुनकर मैं बड़ी आशा लगाये यहाँ आया था; किंतु मेरा शरीर यहाँ सोनेका न हो सका ।। ११३ १/२ ।।
ततो मयोक्तं तद् वाक्यं प्रहस्य ब्राह्मणर्षभाः ॥ ११४ ॥
सक्तुप्रस्थेन यज्ञोऽयं संमितो नेति सर्वथा ।
ब्राह्मणशिरोमणियो! इसीसे मैंने हँसकर कहा था कि यह यज्ञ ब्राह्मणके दिये हुए सेरभर सत्तूके बराबर भी नहीं है। सर्वथा ऐसी ही बात है ।। ११४ १/२ ।।
सक्तुप्रस्थलवैस्तैर्हि तदाहं काञ्चनीकृतः ॥ ११५ ॥
नहि यज्ञो महानेष सदृशस्तैर्मतो मम ।
क्योंकि उस समय सेरभर सत्तूमेंसे गिरे हुए कुछ कणोंके प्रभावसे मेरा आधा शरीर सुवर्णमय हो गया था; परंतु यह महान् यज्ञ भी मुझे वैसा न बना सका; अतः मेरे मतमें यह यज्ञ उन सेरभर सत्तूके कणोंके समान भी नहीं है ।। ११५ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा नकुलः सर्वान् यज्ञे द्विजवरांस्तदा ॥ ११६ ॥
जगामादर्शनं तेषां विप्रास्ते च ययुर्गृहान् ॥ ११७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यज्ञस्थलमें उन समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे ऐसा कहकर वह नेवला वहाँसे गायब हो गया और वे ब्राह्मण भी अपने-अपने घर चले गये ।। ११६-११७ ।।
एतत् ते सर्वमाख्यातं मया परपुरंजय ।
यदाश्चर्यमभूत् तत्र वाजिमेधे महाक्रतौ ॥ ११८ ॥
शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले जनमेजय! वहाँ अश्वमेध नामक महायज्ञमें जो आश्चर्यजनक घटना घटित हुई थी, वह सारा प्रसंग मैंने तुम्हें बता दिया ।। ११८ ।।
न विस्मयस्ते नृपते यज्ञे कार्यः कथंचन ।
ऋषिकोटिसहस्राणि तपोभिर्ये दिवं गताः ॥ ११९ ॥
नरेश्वर! उस यज्ञके सम्बन्धमें ऐसी घटना सुनकर तुम्हें किसी प्रकार विस्मय नहीं करना चाहिये। सहस्रों कोटि ऐसे ऋषि हो गये हैं, जो यज्ञ न करके केवल तपस्याके ही बलसे दिव्य लोकको प्राप्त हो चुके हैं ।। ११९ ।।
अद्रोहः सर्वभूतेषु संतोषः शीलमार्जवम् ।
तपो दमश्च सत्यं च प्रदानं चेति संमितम् ॥ १२० ॥
किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, मनमें संतोष रखना, शील और सदाचारका पालन करना, सबके प्रति सरलतापूर्ण बर्ताव करना, तपस्या करना, मन और इन्द्रियोंको संयममें