महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2053, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘ब्रह्मन्! मेरी ओर देखो, मैं धर्म हूँ। तुम सब लोग अपनी इच्छाके अनुसार इस विमानपर चढ़ो। तुमने अपने इस शरीरका उद्धार कर दिया और लोकमें भी तुम्हारी अविचल कीर्ति बनी रहेगी। तुम पत्नी, पुत्र और पुत्रवधूके साथ स्वर्गलोकको जाओ' ।। १०६ १/२ ।।
इत्युक्तवाक्ये धर्मे तु यानमारुह्य स द्विजः ।। १०७ ।। सदारः ससुतश्चैव सस्नुषश्च दिवं गतः ।
धर्मके ऐसा कहनेपर वे उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मण देवता अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधूके साथ विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकको चले गये ।। १०७ १/२ ।।
तस्मिन् विप्रे गते स्वर्गं ससुते सस्नुषे तदा ।। १०८ ।। भार्याचतुर्थे धर्मज्ञे ततोऽहं निःसृतो बिलात् ।
‘स्त्री, पुत्र और पुत्रवधूके साथ वे धर्मज्ञ ब्राह्मण जब स्वर्गलोकको चले गये, तब मैं अपनी बिलसे बाहर निकला ।। १०८ १/२ ।।
ततस्तु सक्तुगन्धेन क्लेदेन सलिलस्य च ।। १०९ ।। दिव्यपुष्पविमर्दाश्च साधोर्दानलवैश्च तैः । विप्रस्य तपसा तस्य शिरो मे काञ्चनीकृतम् ।। ११० ।।
तदनन्तर सत्तूकी गन्ध सूँघने, वहाँ गिरे हुए जलकी कीचसे सम्पर्क होने, वहाँ गिरे हुए दिव्य पुष्पोंको रौंदने और उन महात्मा ब्राह्मणके दान करते समय गिरे हुए अन्नके कणोंमें मन लगानेसे तथा उन उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणकी तपस्याके प्रभावसे मेरा मस्तक सोनेका हो गया ।। १०९-११० ।।
तस्य सत्याभिसंधस्य सक्तुदानेन चैव ह । शरीरार्धं च मे विप्राः शातकुम्भमयं कृतम् ।। १११ ।।
विप्रवरो! उन सत्यप्रतिज्ञ ब्राह्मणके सत्तूदानसे मेरा यह आधा शरीर भी सुवर्णमय हो गया ।। १११ ।।
पश्यतेमं सुविपुलं तपसा तस्य धीमतः । कथमेवंविधं स्याद् वै पार्श्वमन्यदिति द्विजाः ।। ११२ ।।
उन बुद्धिमान् ब्राह्मणकी तपस्यासे मुझे जो यह महान् फल प्राप्त हुआ है, इसे आपलोग अपनी आँखों देख लीजिये। ब्राह्मणो! अब मैं इस चिन्तामें पड़ा कि मेरे शरीरका दूसरा पार्श्व भी कैसे ऐसा ही हो सकता है? ।। ११२ ।।
तपोवनानि यज्ञांश्च हृष्टोऽभ्येमि पुनः पुनः । यज्ञं त्वहमिमं श्रुत्वा कुरुराजस्य धीमतः ।। ११३ ।। आशया परया प्राप्तो न चाहं काञ्चनीकृतः ।