महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2052, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोप्रदानसहस्राणि द्विजेभ्योऽदान्नृगो नृपः ॥ ९९ ॥ एकां दत्त्वा स पारक्यां नरकं समपद्यत । ‘राजा नृगने ब्राह्मणोंको हजारों गौएँ दान की थीं; किंतु एक ही गौ दूसरेकी दान कर दी, जिससे अन्यायत: प्राप्त द्रव्यका दान करनेके कारण उन्हें नरकमें जाना पड़ा ॥ ९९ ½ ॥
आत्ममांसप्रदानेन शिबिरौशीनरो नृपः ॥ १०० ॥ प्राप्य पुण्यकृताँल्लोकान् मोदते दिवि सुव्रतः । ‘उशीनरके पुत्र उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजा शिबि श्रद्धापूर्वक अपने शरीरका मांस देकर भी पुण्यात्माओंके लोकोंमें अर्थात् स्वर्गमें आनन्द भोगते हैं ॥ १०० ½ ॥
विभवो न नृणां पुण्यं स्वशक्त्या स्वार्जितं सताम् ॥ १०१ ॥ न यज्ञैर्विविधैर्विप्र यथान्यायेन संचितैः । ‘विप्रवर! मनुष्योंके लिये धन ही पुण्यका हेतु नहीं है। साधु पुरुष अपनी शक्तिके अनुसार सुगमतापूर्वक पुण्यका अर्जन कर लेते हैं। न्यायपूर्वक संचित किये हुए अन्नके दानसे जैसा उत्तम फल प्राप्त होता है, वैसा नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे भी नहीं सुलभ होता ॥ १०१ ½ ॥
क्रोधाद् दानफलं हन्ति लोभात् स्वर्गं न गच्छति ॥ १०२ ॥ न्यायवृत्तिर्हि तपसा दानवित् स्वर्गमश्नुते । ‘मनुष्य क्रोधसे अपने दानके फलको नष्ट कर देता है। लोभके कारण वह स्वर्गमें नहीं जाने पाता। न्यायोपार्जित धनसे जीवन-निर्वाह करनेवाला और दानके महत्त्वको जाननेवाला पुरुष दान एवं तपस्याके द्वारा स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है ॥ १०२ ½ ॥
न राजसूयैर्बहुभिरिष्ट्वा विपुलदक्षिणैः ॥ १०३ ॥ न चाश्वमेधैर्बहुभिः फलं सममिदं तव । सक्तुप्रस्थेन विजितो ब्रह्मलोकस्त्वयाक्षयः ॥ १०४ ॥ ‘तुमने जो यह दानजनित फल प्राप्त किया है, इसकी समता प्रचुर दक्षिणावाले बहुसंख्यक राजसूय और अनेक अश्वमेध-यज्ञोंद्वारा भी नहीं हो सकती। तुमने सेरभर सत्तूका दान करके अक्षय ब्रह्मलोकको जीत लिया है ॥ १०३-१०४ ॥
विरजो ब्रह्मसदनं गच्छ विप्र यथासुखम् । सर्वेषां वो द्विजश्रेष्ठ दिव्यं यानमुपस्थितम् ॥ १०५ ॥ ‘विप्रवर! अब तुम सुखपूर्वक रजोगुणरहित ब्रह्मलोकमें जाओ। द्विजश्रेष्ठ! तुम सब लोगोंके लिये यह दिव्य विमान उपस्थित है ॥ १०५ ॥
आरोहत यथाकामं धर्मोऽस्मि द्विज पश्य माम् । तारितो हि त्वया देहो लोके कीर्तिः स्थिरा च ते ॥ १०६ ॥ सभार्यः सहपुत्रश्च सस्नुषश्च दिवं व्रज ।