महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2065)
महर्षि अगस्त्यकी यज्ञके समय प्रतिज्ञा
‘दिव्य अप्सराओंके समुदाय, गन्धर्व, किन्नर, विश्वावसु तथा जो अन्य प्रमुख गन्धर्व हैं, वे सब यहाँ आकर मेरे यज्ञकी उपासना करें ।। २५ १/२ ।।
उत्तरेभ्यः कुरुभ्यश्च यत् किंचिद् वसु विद्यते ।। २६ ।।
सर्वं तदिह यज्ञेषु स्वयमेवोपनिष्ठतु ।
स्वर्गः स्वर्गसदश्चैव धर्मश्च स्वयमेव तु ।। २७ ।।
‘उत्तर कुरुवर्षमें जो कुछ धन है, वह सब स्वयं यहाँ मेरे यज्ञोंमें उपस्थित हो। स्वर्ग, स्वर्गवासी देवता और धर्म स्वयं यहाँ विराजमान हो जायँ’ ।। २६-२७ ।।
इत्युक्ते सर्वमेवैतदभवत् तपसा मुनेः ।
तस्य दीप्ताग्निमहसस्त्वगस्त्यस्यातितेजसः ।। २८ ।।
प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, अतिशय कान्तिमान् महर्षि अगस्त्यके इतना कहते ही उनकी तपस्याके प्रभावसे ये सारी वस्तुएँ वहाँ प्रस्तुत हो गयीं ।। २८ ।।
ततस्ते मुनयो हृष्टा ददृशुस्तपसो बलम् ।
विस्मिता वचनं प्राहुरिदं सर्वे महार्थवत् ।। २९ ।।
उन महर्षियोंने बड़े हर्षके साथ महर्षिके उस तपोबलको प्रत्यक्ष देखा। देखकर वे सब लोग आश्चर्यचकित हो गये और इस प्रकार महान् अर्थसे भरे हुए वचन बोले ।। २९ ।।
ऋषय ऊचुः
प्रीताः स्म तव वाक्येन न त्विच्छामस्तपोव्ययम् ।
तैरेव यज्ञैस्तुष्टाः स्म न्यायेनेच्छामहे वयम् ।। ३० ।।
ऋषि बोले— महर्षे! आपकी बातोंसे हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। हम आपकी तपस्याका व्यय होना नहीं चाहते हैं। हम आपके उन्हीं यज्ञोंसे संतुष्ट हैं और न्यायसे उपार्जित अन्नकी ही इच्छा रखते हैं ।। ३० ।।
यज्ञं दीक्षां तथा होमान् यच्चान्यन्मृगयामहे ।
न्यायेनोपार्जिताहाराः स्वकर्माभिरता वयम् ।। ३१ ।।
यज्ञ, दीक्षा, होम तथा और जो कुछ हम खोजा करते हैं, वह सब हमें यहाँ प्राप्त है। न्यायसे उपार्जित किया हुआ अन्न ही हमारा भोजन है और हम सदा अपने कर्मोंमें लगे रहते हैं ।। ३१ ।।
वेदांश्च ब्रह्मचर्येण न्यायतः प्रार्थयामहे ।
न्यायेनोत्तरकालं च गृहेभ्यो निःसृता वयम् ।। ३२ ।।
हम ब्रह्मचर्यका पालन करके न्यायतः वेदोंको प्राप्त करना चाहते हैं और अन्तमें न्यायपूर्वक ही हम घर छोड़कर निकले हैं ।। ३२ ।।
धर्मदृष्टैर्विधिद्वारैस्तपस्तप्स्यामहे वयम् ।
भवतः सम्यगिष्टा तु बुद्धिर्हिंसाविवर्जिता ।। ३३ ।।
एतामहिंसां यज्ञेषु ब्रूयास्त्वं सततं प्रभो । प्रीतास्ततो भविष्यामो वयं तु द्विजसत्तम ॥ ३४ ॥ विसर्जिताः समाप्तौ च सत्रादस्माद् व्रजामहे । धर्मशास्त्रमें देखे गये विधि-विधानसे ही हम तपस्या करेंगे। आपको हिंसारहित बुद्धि ही अधिक प्रिय है; अतः प्रभो! आप यज्ञोंमें सदा इस अहिंसाका ही प्रतिपादन करें। द्विजश्रेष्ठ! ऐसा करनेसे हम आपपर बहुत प्रसन्न होंगे। यज्ञकी समाप्ति होनेपर जब आप हमें विदा करेंगे, तब हम यहाँसे अपने घरको जायेंगे ॥ ३३-३४ १/२ ॥ तथा कथयतां तेषां देवराजः पुरंदरः ॥ ३५ ॥ ववर्ष सुमहातेजा दृष्ट्वा तस्य तपोबलम् । आसमाप्तेश्च यज्ञस्य तस्यामितपराक्रमः ॥ ३६ ॥ निकामवर्षी पर्जन्यो बभूव जनमेजय । जनमेजय! जब ऋषि लोग ऐसी बातें कह रहे थे, उसी समय महा तेजस्वी देवराज इन्द्रने महर्षिका तपोबल देखकर पानी बरसाना आरम्भ किया। जबतक उस यज्ञकी समाप्ति नहीं हुई, तबतक अमितपराक्रमी इन्द्रने वहाँ इच्छानुसार वर्षा की ॥ ३५-३६ १/२ ॥ प्रसादयामास च तमगस्त्यं त्रिदशेश्वरः । स्वयमभ्येत्य राजर्षे पुरस्कृत्य बृहस्पतिम् ॥ ३७ ॥ राजर्षे! देवेश्वर इन्द्रने स्वयं आकर बृहस्पतिको आगे करके अगस्त्य ऋषिको मनाया ॥ ३७ ॥ ततो यज्ञसमाप्तौ तान् विससर्ज महामुनीन् । अगस्त्यः परमप्रीतः पूजयित्वा यथाविधि ॥ ३८ ॥ तदनन्तर यज्ञ समाप्त होनेपर अत्यन्त प्रसन्न हुए अगस्त्यजीने उन महामुनियोंकी विधिवत् पूजा करके सबको विदा कर दिया ॥ ३८ ॥
जनमेजय उवाच
कोऽसौ नकुलरूपेण शिरसा काञ्चनेन वै । प्राह मानुषवद् वाचमेतत् पृष्टो वदस्व मे ॥ ३९ ॥ जनमेजयने पूछा—मुने! सोनेके मस्तकसे युक्त वह नेवला कौन था, जो मनुष्योंकी-सी बोली बोलता था? मेरे इस प्रश्नका मुझे उत्तर दीजिये ॥ ३९ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतत् पूर्वं न पृष्टोऽहं न चास्माभिः प्रभाषितम् । श्रूयतां नकुलो योऽसौ यथा वाक् तस्य मानुषी ॥ ४० ॥ वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! यह बात न तो तुमने पहले पूछी थी और न मैंने बतायी थी। अब पूछते हो तो सुनो। वह नकुल कौन था और उसकी मनुष्योंकी-सी बोली
कैसे हुई, यह सब बता रहा हूँ ॥ ४० ॥ श्राद्धं संकल्पयामास जमदग्निः पुरा किल । होमधेनुस्तमागाच्च स्वयमेव दुदोह ताम् ॥ ४१ ॥ पूर्वकालकी बात है, एक दिन जमदग्नि ऋषिने श्राद्ध करनेका संकल्प किया। उस समय उनकी होमधेनु स्वयं ही उनके पास आयी और मुनिने स्वयं ही उसका दूध दुहा ॥ ४१ ॥ तत् पयः स्थापयामास नवे भाण्डे दृढे शुचौ । तच्च क्रोधस्वरूपेण पिठरं धर्म आविशत् ॥ ४२ ॥ उस दूधको उन्होंने नये पात्रमें, जो सुदृढ़ और पवित्र था, रख दिया। उस पात्रमें धर्मने क्रोधका रूप धारण करके प्रवेश किया ॥ ४२ ॥ जिज्ञासुस्तमृषिश्रेष्ठं किं कुर्याद् विप्रिये कृते । इति संचिन्त्य धर्मः स धर्षयामास तत् पयः ॥ ४३ ॥ धर्म उन मुनिश्रेष्ठकी परीक्षा लेना चाहते थे। उन्होंने सोचा, देखूँ तो ये अप्रिय करनेपर क्या करते हैं? इसीलिये उन्होंने उस दूधको क्रोधके स्पर्शसे दूषित कर दिया ॥ ४३ ॥ तमाज्ञाय मुनिः क्रोधं नैवास्य स चुकोप ह । स तु क्रोधस्ततो राजन् ब्राह्मणीं मूर्त्तिमास्थितः । जिते तस्मिन् भृगुश्रेष्ठमभ्यभाषदमर्षणः ॥ ४४ ॥ राजन्! मुनिने उस क्रोधको पहचान लिया; किंतु उसपर वे कुपित नहीं हुए। तब क्रोधने ब्राह्मणका रूप धारण किया। मुनिके द्वारा पराजित होनेपर उस अमर्षशील क्रोधने उन भृगुश्रेष्ठसे कहा— ॥ ४४ ॥ जितोऽस्मीति भृगुश्रेष्ठ भृगवो ह्यतिरोषणाः । लोके मिथ्या प्रवादोऽयं यत्त्वयास्मि विनिर्जितः ॥ ४५ ॥ ‘भृगुश्रेष्ठ! मैं तो पराजित हो गया। मैंने सुना था कि भृगुवंशी ब्राह्मण बड़े क्रोधी होते हैं; परंतु लोकमें प्रचलित हुआ यह प्रवाद आज मिथ्या सिद्ध हो गया; क्योंकि आपने मुझे जीत लिया ॥ ४५ ॥ वशे स्थितोऽहं त्वय्यद्य क्षमावति महात्मनि । बिभेमि तपसः साधो प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥ ४६ ॥ ‘प्रभो! आज मैं आपके वशमें हूँ। आपकी तपस्यासे डरता हूँ। साधो! आप क्षमाशील महात्मा हैं, मुझपर कृपा कीजिये’ ॥ ४६ ॥
जमदग्निरुवाच साक्षाद् दृष्टोऽसि मे क्रोध गच्छ त्वं विगतज्वरः । न त्वयापकृतं मेऽद्य न च मे मन्युरस्ति वै ॥ ४७ ॥
जमदग्नि बोले— क्रोध! मैंने तुम्हें प्रत्यक्ष देखा है। तुम निश्चिन्त होकर यहाँसे जाओ। तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया है; अतः आज तुमपर मेरा रोष नहीं है॥ ४७॥
यान् समुद्दिश्य संकल्पः पयसोऽस्य कृतो मया।
पितरस्ते महाभागास्तेभ्यो बुद्ध्यस्व गम्यताम् ॥ ४८ ॥
मैंने जिन पितरोंके उद्देश्यसे इस दूधका संकल्प किया था, वे महाभाग पितर ही उसके स्वामी हैं। जाओ, उन्हींसे इस विषयमें समझो॥ ४८॥
इत्युक्तो जातसंत्रासस्तत्रैवान्तरधीयत।
पितॄणामभिशङ्गाच्च नकुलत्वमुपागतः ॥ ४९ ॥
मुनिके ऐसा कहनेपर क्रोधरूपधारी धर्म भयभीत हो वहाँसे अदृश्य हो गये और पितरोंके शापसे उन्हें नेवला होना पड़ा॥ ४९॥
स तान् प्रसादयामास शापस्यान्तो भवेदिति।
तैश्चाप्युक्तः क्षिपन् धर्मं शापस्यान्तमवाप्स्यसि ॥ ५० ॥
इस शापका अन्त होनेके उद्देश्यसे उन्होंने पितरोंको प्रसन्न किया। तब पितरोंने कहा—‘तुम धर्मराज युधिष्ठिरपर आक्षेप करके इस शापसे छुटकारा पा जाओगे’॥ ५०॥
तैश्चोक्तो यज्ञियान् देशान् धर्मारण्यं तथैव च।
जुगुप्समानो धावन् स तं यज्ञं समुपासदत् ॥ ५१ ॥
उन्होंने ही उस नेवलेको यज्ञसम्बन्धी स्थान और धर्मारण्यका पता बताया था। वह धर्मराजकी निन्दाके उद्देश्यसे दौड़ता हुआ उस यज्ञमें जा पहुँचा था॥ ५१॥
धर्मपुत्रमथाक्षिप्य सक्तुप्रस्थेन तेन सः।
मुक्तः शापात् ततः क्रोधो धर्मो ह्यासीद् युधिष्ठिरः ॥ ५२ ॥
धर्मपुत्र युधिष्ठिरपर आक्षेप करते हुए सेरभर सत्तूके दानका माहात्म्य बताकर क्रोधरूपधारी धर्म शापसे मुक्त हो गया और वह धर्मराज युधिष्ठिरमें स्थित हो गया॥ ५२॥
एवमेतत् तदा वृत्ते यज्ञे तस्य महात्मनः।
पश्यतां चापि नस्तत्र नकुलोऽन्तर्हितस्तदा ॥ ५३ ॥
इस प्रकार महात्मा युधिष्ठिरका यज्ञ समाप्त होनेपर यह घटना घटी थी और वह नेवला हमलोगोंके देखते-देखते वहाँसे गायब हो गया था॥ ५३॥
१. खाद्य पदार्थको पत्थरपर फोड़कर खानेवाले। २. सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले। ३. पूछकर दिये हुए अन्नको ही लेनेवाले। ४. यज्ञशिष्ट अन्नको ही भोजन करनेवाले। ५. तत्त्वका विचार करनेवाले।
* संचित अन्नका व्यय किये बिना ही उसके स्पर्शमात्रसे देवताओंको तृप्त करनेकी जो भावना है, उसका नाम स्पर्शयज्ञ है।
(वैष्णवधर्म-पर्व)
(वैष्णवधर्म-पर्व)
[युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन]
[युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन]
जनमेजय उवाच
अश्वमेधे पुरा वृत्ते केशवं केशिसूदनम् ।
धर्मसंशयमुद्दिश्य किमपृच्छत् पितामहः ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! पूर्वकालमें जब मेरे पितामह महाराज युधिष्ठिरका अश्वमेध-यज्ञ पूर्ण हो गया, तब उन्होंने धर्मके विषयमें संदेह होनेपर भगवान् श्रीकृष्णसे कौन-सा प्रश्न किया? ।।
वैशम्पायन उवाच
पश्चिमेनाश्वमेधेन यदा स्नातो युधिष्ठिरः ।
तदा राजा नमस्कृत्य केशवं पुनरब्रवीत् ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! अश्वमेध-यज्ञके बाद जब धर्मराज युधिष्ठिरने अवभृथ-स्नान कर लिया, तब भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम करके इस प्रकार पूछना आरम्भ किया ।।
वशिष्ठाद्यास्तपोयुक्ता मुनयस्तत्त्वदर्शिनः ।
श्रोतुकामाः परं गुह्यं वैष्णवं धर्ममुत्तमम् ।
तथा भागवताश्चैव ततस्तं पर्यवारयन् ॥
उस समय वसिष्ठ आदि तत्त्वदर्शी तपस्वी मुनिगण तथा अन्य भक्तगण उस परम गोपनीय उत्तम वैष्णव-धर्मको सुननेकी इच्छासे भगवान् श्रीकृष्णको घेरकर बैठ गये ।।
युधिष्ठिर उवाच
तत्त्वतस्तव भावेन पादमूलमुपागतम् ।
यदि जानासि मां भक्तं स्निग्धं वा भक्तवत्सल ॥
धर्मगुह्यानि सर्वाणि वेत्तुमिच्छामि तत्त्वतः ।
धर्मान् कथय मे देव यद्यनुग्रहभागहम् ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भक्तवत्सल! मैं सच्चे भक्तिभावसे आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ। भगवन्! यदि आप मुझे अपना प्रेमी या भक्त समझते हैं और यदि मैं आपके अनुग्रहका अधिकारी होऊँ तो मुझसे वैष्णव-धर्मोंका वर्णन कीजिये। मैं उनके सम्पूर्ण रहस्योंको यथार्थ रूपसे जानना चाहता हूँ ।।
श्रुता मे मानवा धर्मा वाशिष्ठाः काश्यपास्तथा ।
गार्गीया गौतमीयाश्च तथा गोपालकस्य च ॥
पराशरकृताः पूर्वा मैत्रेयस्य च धीमतः ।
औमा माहेश्वराश्चैव नन्दिधर्माश्च पावनाः ।। मैंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, गोपालक, पराशर, बुद्धिमान् मैत्रेय, उमा, महेश्वर और नन्दिद्वारा कहे हुए पवित्र धर्मोंका श्रवण किया है ।। ब्रह्मणा कथिता ये च कौमाराश्च श्रुता मया । धूमायनकृता धर्माः काण्डवैश्वानरा अपि ।। भार्गवा याज्ञवल्क्याश्च मार्कण्डेयकृता अपि । भारद्वाजकृता ये च बृहस्पतिकृताश्च ये ।। कुणेश्च कुणिबाहोश्च विश्वामित्रकृताश्च ये । सुमन्तुजैमिनिकृताः शाकुनेयास्तथैव च ।। पुलस्त्यपुलहोद्गीताः पावकीयास्तथैव च । अगस्त्यगीता मौद्गल्याः शाण्डिल्याः शलभायनाः ।। बालखिल्यकृता ये च ये च सप्तर्षिभिस्तथा । आपस्तम्बकृता धर्माः शंखस्य लिखितस्य च ।। प्राजापत्यास्तथा याम्या माहेन्द्राश्च श्रुता मया । वैयाघ्रव्यासकीयाश्च विभाण्डककृताश्च ये ।। तथा जो ब्रह्मा, कार्तिकेय, धूमायन, काण्ड, वैश्वानर, भार्गव, याज्ञवल्क्य और मार्कण्डेयके द्वारा भी कहे गये हैं एवं जो भरद्वाज और बृहस्पतिके बनाये हुए हैं तथा जो कुणि, कुणिबाहु, विश्वामित्र, सुमन्तु, जैमिनि, शकुनि, पुलस्त्य, पुलह, अग्नि, अगस्त्य, मुद्गल, शाण्डिल्य, शलभ, बालखिल्यगण, सप्तर्षि, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, प्रजापति, यम, महेन्द्र, व्याघ्र, व्यास और विभाण्डकके द्वारा कहे गये हैं, उनको भी मैंने सुना है ।। नारदीयाः श्रुता धर्माः कापोताश्च श्रुता मया । तथा विदुरवाक्यानि भृगोरङ्गिरसस्तथा ।। क्रौञ्चा मृदङ्गगीताश्च सौर्या हारीतकाश्च ये । ये पिशङ्गकृताश्चापि कापोतीयाः सुबालकाः ।। उद्दालककृता धर्मा औशनस्यास्तथैव च । वैशम्पायनगीताश्च ये चान्येऽप्येवमादितः ।। एवं जो नारद, कपोत, विदुर, भृगु, अंगिरा, क्रौंच, मृदंग, सूर्य, हारीत, पिशंग, कपोत, सुबालक, उद्दालक, शुक्राचार्य, वैशम्पायन तथा दूसरे-दूसरे महात्माओंके द्वारा बताये हुए हैं, उन धर्मोंका भी मैंने आद्योपान्त श्रवण किया है ।। एतेभ्यः सर्वधर्मेभ्यो देव त्वन्मुखनिःसृताः । पावनत्वात् पवित्रत्वाद् विशिष्टा इति मे मतिः ।। परन्तु भगवन्! मुझे विश्वास है कि आपके मुखसे जो धर्म प्रकट हुए हैं, वे पवित्र और पावन होनेके कारण उपर्युक्त सभी धर्मोंसे श्रेष्ठ हैं ।।
तस्माद्धि त्वां प्रपन्नस्य त्वद्भक्तस्य च केशव ।
युष्मदीयान् वरान् धर्मान् पुण्यान् कथय मेऽच्युत ।।
इसलिये केशव! अच्युत! आपकी शरणमें आये हुए मुझ भक्तसे आप अपने पवित्र एवं श्रेष्ठ धर्मोंका वर्णन कीजिये ।।
वैशम्पायन उवाच
एवं पृष्टस्तु धर्मज्ञो धर्मपुत्रेण केशवः ।
उवाच धर्मान् सूक्ष्मार्थान् धर्मपुत्रस्य हर्षितः ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! धर्मपुत्र युधिष्ठिरके इस प्रकार प्रश्न करनेपर सम्पूर्ण धर्मोंको जाननेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे धर्मके सूक्ष्म विषयोंका वर्णन करने लगे— ।।
एवं ते यस्य कौन्तेय यत्नो धर्मेषु सुव्रत ।
तस्य ते दुर्लभो लोके न कश्चिदपि विद्यते ।।
‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुन्तीनन्दन! तुम धर्मके लिये इतना उद्योग करते हो, इसलिये तुम्हें संसारमें कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है ।।
धर्मःश्रुतो वा दृष्टो वा कथितो वा कृतोऽपि वा ।
अनुमोदितो वा राजेन्द्र नयतीन्द्रपदं नरम् ।।
‘राजेन्द्र! सुना हुआ, देखा हुआ, कहा हुआ, पालन किया हुआ और अनुमोदन किया हुआ धर्म मनुष्यको इन्द्रपदपर पहुँचा देता है ।।
धर्मः पिता च माता च धर्मो नाथः सुहृत् तथा ।
धर्मो भ्राता सखा चैव धर्मः स्वामी परंतप ।।
‘परंतप! धर्म ही जीवका माता-पिता, रक्षक, सुहृद्, भ्राता, सखा और स्वामी है ।।
धर्मादर्थश्च कामश्च धर्माद् भोगाः सुखानि च ।
धर्मादैश्वर्यमेवाग्र्यं धर्मात् स्वर्गगतिः परा ।।
‘अर्थ, काम, भोग, सुख, उत्तम ऐश्वर्य और सर्वोत्तम स्वर्गकी प्राप्ति भी धर्मसे ही होती है ।।
धर्मोऽयं सेवितः शुद्धस्त्रायते महतो भयात् ।
धर्माद् द्विजत्वं देवत्वं धर्मः पावयते नरम् ।।
‘यदि इस विशुद्ध धर्मका सेवन किया जाय तो वह महान् भयसे रक्षा करता है। धर्मसे ही मनुष्यको ब्राह्मणत्व और देवत्वकी प्राप्ति होती है। धर्म ही मनुष्यको पवित्र करता है ।।
यदा च क्षीयते पापं कालेन पुरुषस्य तु ।
तदा संजायते बुद्धिर्धर्मं कर्तुं युधिष्ठिर ।।
'युधिष्ठिर! जब काल-क्रमसे मनुष्यका पाप नष्ट हो जाता है, तभी उसकी बुद्धि धर्माचरणमें लगती है ।। जन्मान्तरसहस्रैस्तु मनुष्यत्वं हि दुर्लभम् । तद् गत्वापीह यो धर्मं न करोति स्ववञ्चितः ।। 'हजारों योनियोंमें भटकनेके बाद भी मनुष्ययोनिका मिलना कठिन होता है। ऐसे दुर्लभ मनुष्य-जन्मको पाकर भी जो धर्मका अनुष्ठान नहीं करता, वह महान् लाभसे वंचित रह जाता है ।। कुत्सिता ये दरिद्राश्च विरूपा व्याधितास्तथा । परद्वेष्याश्च मूर्खाश्च न तैर्धर्मः कृतः पुरा ।। 'आज जो लोग निन्दित, दरिद्र, कुरूप, रोगी, दूसरोंके द्वेषपात्र और मूर्ख देखे जाते हैं, उन्होंने पूर्वजन्ममें धर्मका अनुष्ठान नहीं किया है ।। ये च दीर्घायुषः शूराः पण्डिता भोगिनस्तथा । नीरोगा रूपसम्पन्नास्तैर्धर्मः सुकृतः पुरा ।। 'किंतु जो दीर्घजीवी शूर-वीर, पण्डित, भोग-सामग्रीसे सम्पन्न, नीरोग और रूपवान् हैं, उनके द्वारा पूर्वजन्ममें निश्चय ही धर्मका सम्पादन हुआ है ।। एवं धर्मः कृतः शुद्धो नयते गतिमुत्तमाम् । अधर्मं सेवते यस्तु तिर्यग्योन्यां पतत्यसौ ।। 'इस प्रकार शुद्धभावसे किया हुआ धर्मका अनुष्ठान उत्तम गतिकी प्राप्ति कराता है, परंतु जो अधर्मका सेवन करते हैं, उन्हें पशु-पक्षी आदि तिर्यग्योनियोंमें गिरना पड़ता है ।। इदं रहस्यं कौन्तेय शृणु धर्ममनुत्तमम् । कथयिष्ये परं धर्मं तव भक्तस्य पाण्डव ।। 'कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर! अब मैं तुम्हें एक रहस्यकी बात बताता हूँ, सुनो। पाण्डुनन्दन! मैं तुझ भक्तसे परम धर्मका वर्णन अवश्य करूँगा ।। इष्टस्त्वमसि मेऽत्यर्थं प्रपन्नश्चापि मां सदा । परमार्थमपि ब्रूयां किं पुनर्धर्मसंहिताम् ।। 'तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो और सदा मेरी शरणमें स्थित रहते हो। तुम्हारे पूछनेपर मैं परम गोपनीय आत्मतत्त्वका भी वर्णन कर सकता हूँ, फिर धर्मसंहिताके लिये तो कहना ही क्या है? ।। इदं मे मानुषं जन्म कृतमात्मनि मायया । धर्मसंस्थापनार्थाय दुष्टानां नाशनाय च ।। 'इस समय धर्मकी स्थापना और दुष्टोंका विनाश करनेके लिये मैंने अपनी मायासे मानव-शरीरमें अवतार धारण किया है ।। मानुष्यं भावमापन्नं ये मां गृह्णन्त्यवज्ञया ।
संसारान्तर्हि ते मूढास्तिर्यग्योनिष्वनेकशः ।। 'जो लोग मुझे केवल मनुष्य-शरीरमें ही समझकर मेरी अवहेलना करते हैं, वे मूर्ख हैं और संसारके भीतर बारंबार तिर्यग्योनियोंमें भटकते रहते हैं ।।'
ये च मां सर्वभूतस्थं पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषा । मद्भक्तांस्तान् सदा युक्तान् मत्समीपं नयाम्यहम् ।। 'इसके विपरीत जो ज्ञानदृष्टिसे मुझे सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित देखते हैं, वे सदा मुझमें मन लगाये रहनेवाले मेरे भक्त हैं, ऐसे भक्तोंको मैं परम धाममें अपने पास बुला लेता हूँ ।।'
मद्भक्ता न विनश्यन्ति मद्भक्ता वीतकल्मषाः । मद्भक्तानां तु मानुष्ये सफलं जन्म पाण्डव ।। 'पाण्डुपुत्र! मेरे भक्तोंका नाश नहीं होता, वे निष्पाप होते हैं। मनुष्योंमें उन्हींका जन्म सफल है, जो मेरे भक्त हैं ।।'
अपि पापेष्वभिरता मद्भक्ताः पाण्डुनन्दन । मुच्यन्ते पातकैः सर्वैः पद्मपत्रमिवाम्भसा ।। 'पाण्डुनन्दन! पापोंमें अभिरत रहनेवाले मनुष्य भी यदि मेरे भक्त हो जायँ तो वे सारे पापोंसे वैसे ही मुक्त हो जाते हैं, जैसे जलसे कमलका पत्ता निर्लिप्त रहता है ।।'
जन्मान्तरसहस्रेषु तपसा भावितात्मनाम् । भक्तिरुत्पद्यते तात मनुष्याणां न संशयः ।। 'हजारों जन्मोंतक तपस्या करनेसे जब मनुष्योंका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब उसमें निःसंदेह भक्तिका उदय होता है ।।'
यच्च रूपं परं गुह्यं कूटस्थमचलं ध्रुवम् । न दृश्यते तथा देवैर्मद्भक्तैर्दृश्यते यथा ।। 'मेरा जो अत्यन्त गोपनीय कूटस्थ, अचल और अविनाशी परस्वरूप है, उसका मेरे भक्तोंको जैसा अनुभव होता है, वैसा देवताओंको भी नहीं होता ।।'
अपरं यच्च मे रूपं प्रादुर्भावेषु दृश्यते । तदर्चयन्ति सर्वार्थैः सर्वभूतानि पाण्डव ।। 'पाण्डव! जो मेरा अपरस्वरूप है, वह अवतार लेनेपर दृष्टिगोचर होता है। संसारके समस्त जीव सब प्रकारके पदार्थोंसे उसकी पूजा करते हैं ।।'
कल्पकोटिसहस्रेषु व्यतीतेष्वागतेषु च । दर्शयामीह तद् रूपं यच्च पश्यन्ति मे सुराः ।। 'हजारों और करोड़ों कल्प आकर चले गये, पर जिस वैष्णवरूपको देवगण देखते हैं, उसी रूपसे मैं भक्तोंको दर्शन देता हूँ ।।'
स्थित्युत्पत्त्यव्ययकरं यो मां ज्ञात्वा प्रपद्यते । अनुगृह्णाम्यहं तं वै संसारान्मोचयामि च ।।
'जो मनुष्य मुझे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहारका कारण समझकर मेरी शरण लेता है, उसके ऊपर कृपा करके मैं उसे संसार-बन्धनसे मुक्त कर देता हूँ ।। अहमादिर्हि देवानां सृष्टा ब्रह्मादयो मया । प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य जगत् सर्वं सृजाम्यहम् ।। 'मैं ही देवताओंका आदि हूँ। ब्रह्मा आदि देवताओंकी मैंने ही सृष्टि की है। मैं ही अपनी प्रकृतिका आश्रय लेकर सम्पूर्ण संसारकी सृष्टि करता हूँ ।। तमोमूलोऽहमव्यक्तो रजोमध्ये प्रतिष्ठितः । ऊर्ध्वं सत्त्वं विना लोभं ब्रह्मादिस्तम्बपर्यतः ।। 'मैं अव्यक्त परमेश्वर ही तमोगुणका आधार, रजोगुणके भीतर स्थित और उत्कृष्ट सत्त्वगुणमें भी व्याप्त हूँ। मुझे लोभ नहीं है। ब्रह्मासे लेकर छोटेसे कीड़ेतक सबमें मैं व्याप्त हो रहा हूँ ।। मूर्द्धानं मे विद्धि दिवं चन्द्रादित्यौ च लोचने । गावोऽग्निर्ब्राह्मणो वक्त्रं मारुतः श्वसनं च मे ।। 'द्युलोकको मेरा मस्तक समझो। सूर्य और चन्द्रमा मेरी आँखें हैं। गौ, अग्नि और ब्राह्मण मेरे मुख हैं और वायु मेरी साँस है ।। दिशो मे बाहवश्चाष्टौ नक्षत्राणि च भूषणम् । अन्तरिक्षमुरो विद्धि सर्वभूतावकाशकम् । मार्गों मेघानिलाभ्यां तु यन्ममोदरमव्ययम् ।। 'आठ दिशाएँ मेरी बाँहें, नक्षत्र मेरे आभूषण और सम्पूर्ण भूतोंको अवकाश देनेवाला अन्तरिक्ष मेरा वक्षःस्थल है। बादलों और हवाके चलनेका जो मार्ग है, उसे मेरा अविनाशी उदर समझो ।। पृथिवीमण्डलं यद् वै द्वीपार्णववनैर्युतम् । सर्वसंधारणोपेतं पादौ मम युधिष्ठिर ।। 'युधिष्ठिर! द्वीप, समुद्र और जंगलोंसे भरा हुआ यह सबको धारण करनेवाला भूमण्डल मेरे दोनों पैरोंके स्थानमें है ।। स्थितो ह्येकगुणः खेऽहं द्विगुणश्चास्मि मारुते । त्रिगुणोऽग्नौ स्थितोऽहं वै सलिले च चतुर्गुणः ।। शब्दाद्या ये गुणाः पञ्च महाभूतेषु पञ्चसु । तन्मात्रासंस्थितः सोऽहं पृथिव्यां पञ्चधा स्थितः ।। 'आकाशमें मैं एक गुणवाला हूँ, वायुमें दो गुणवाला हूँ, अग्निमें तीन गुणवाला हूँ और जलमें चार गुणवाला हूँ। पृथिवीमें पाँच गुणोंसे स्थित हूँ। वही मैं तन्मात्रारूप पञ्चमहाभूतोंमें शब्दादि पाँच गुणोंसे स्थित हूँ ।। अहं सहस्रशीर्षस्तु सहस्रवदनेक्षणः ।
सहस्रबाहूदरधृक् सहस्रोरु सहस्रपात् ।।
‘मेरे हजारों मस्तक, हजारों मुख, हजारों नेत्र, हजारों भुजाएँ, हजारों उदर, हजारों ऊरु और हजारों पैर हैं ।।
धृत्वोर्वीं सर्वतः सम्यगत्यतिष्ठं दशाङ्गुलम् ।
सर्वभूतात्मभूतस्थः सर्वव्यापी ततोऽस्म्यहम् ।।
‘मैं पृथ्वीको सब ओरसे धारण करके नाभिसे दस अंगुल ऊँचे सबके हृदयमें विराजमान हूँ। सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मरूपसे स्थित हूँ, इसलिये सर्वव्यापी कहलाता हूँ ।।
अचिन्त्योऽहमनन्तोऽहमजरोऽहमजो ह्यहम् ।
अनाद्योऽहमवध्योऽहमप्रमेयोऽहमव्ययः ।।
निर्गुणोऽहं निगूढात्मा निर्द्वन्द्वो निर्ममो नृप ।
निष्कलो निर्विकारोऽहं निदानममृतस्य तु ।।
सुधा चाहं स्वधा चाहं स्वाहा चाहं नराधिप ।
‘राजन्! मैं अचिन्त्य, अनन्त, अजर, अजन्मा, अनादि, अवध्य, अप्रमेय, अव्यय, निर्गुण, गुह्यस्वरूप, निर्द्वन्द्व, निर्मम, निष्कल, निर्विकार और मोक्षका आदि कारण हूँ। नरेश्वर! सुधा, स्वधा और स्वाहा भी मैं ही हूँ ।।
तेजसा तपसा चाहं भूतग्रामं चतुर्विधम् ।।
स्नेहपाशैर्गुणैर्बद्ध्वा धारयाम्यात्ममायया ।
‘मैंने ही अपने तेज और तपसे चार प्रकारके प्राणिसमुदायको स्नेहपाशरूप रज्जुसे बाँधकर अपनी मायासे धारण कर रखा है ।।
चातुराश्रमधर्मोऽहं चातुर्होत्रफलाशनः ।
चतुर्मूर्तिश्चतुर्यज्ञश्चतुराश्रमभावनः ।।
‘मैं चारों आश्रमोंका धर्म, चार प्रकारके होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका फल भोगनेवाला चतुर्व्यूह, चतुर्यज्ञ और चारों आश्रमोंको प्रकट करनेवाला हूँ ।।
संहृत्याहं जगत् सर्वं कृत्वा वै गर्भमात्मनः ।
शयामि दिव्ययोगेन प्रलयेषु युधिष्ठिर ।।
‘युधिष्ठिर! प्रलयकालमें समस्त जगत्का संहार करके उसे अपने उदरमें स्थापित कर दिव्य योगका आश्रय ले मैं एकार्णवके जलमें शयन करता हूँ ।।
सहस्रयुगपर्यन्तां ब्राह्मीं रात्रिं महार्णवे ।
स्थित्वा सृजामि भूतानि जङ्गमानि स्थिराणि च ।।
‘एक हजार युगोंतक रहनेवाली ब्रह्माकी रात पूर्ण होनेतक महार्णवमें शयन करनेके पश्चात् स्थावर-जंगम प्राणियोंकी सृष्टि करता हूँ ।।
कल्पे कल्पे च भूतानि संहरामि सृजामि च ।
न च मां तानि जानन्ति मायया मोहितानि मे ।।
'प्रत्येक कल्पमें मेरे द्वारा जीवोंकी सृष्टि और संहारका कार्य होता है, किंतु मेरी मायासे मोहित होनेके कारण वे जीव मुझे नहीं जान पाते ।। मम चैवान्धकारस्य मार्गितव्यस्य नित्यशः। प्रशान्तस्येव दीपस्य गतिर्नैवोपलभ्यते ।। 'प्रलयकालमें जब दीपकके शान्त होनेकी भाँति समस्त व्यक्त सृष्टि लुप्त हो जाती है, तब खोज करने योग्य मुझ अदृश्यरूपकी गतिका उनको पता नहीं लगता ।। न तदस्ति क्वचिद् राजन् यत्राहं न प्रतिष्ठितः। न च तद् विद्यते भूतं मयि यन्न प्रतिष्ठितम् ।। 'राजन्! कहीं कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जिसमें मेरा निवास न हो तथा कोई ऐसा जीव नहीं है, जो मुझमें स्थित न हो ।। यावन्मात्रं भवेद् भूतं स्थूलं सूक्ष्ममिदं जगत् । जीवभूतो ह्यहं तस्मिंस्तावन्मात्रं प्रतिष्ठितः ।। 'जो कुछ भी स्थूल-सूक्ष्मरूप यह जगत् हो चुका है और होनेवाला है, उन सबमें उसी प्रकार मैं ही जीवरूपसे स्थित हूँ ।। किं चात्र बहुनोक्तेन सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । यद् भूतं यद् भविष्यच्च तत् सर्वमहमेव तु ।। 'अधिक कहनेसे क्या लाभ, मैं तुमसे यह सच्ची बात बता रहा हूँ कि भूत और भविष्य जो कुछ है, वह सब मैं ही हूँ ।। मया सृष्टानि भूतानि मन्मयानि च भारत । मामेव न विजानन्ति मायया मोहितानि वै ।। 'भरतनन्दन! सम्पूर्ण भूत मुझसे ही उत्पन्न होते हैं और मेरे ही स्वरूप हैं। फिर भी मेरी मायासे मोहित रहते हैं, इसलिये मुझे नहीं जान पाते ।। एवं सर्व जगदिदं सदेवासुरमानुषम् । मत्तः प्रभवते राजन् मय्येव प्रविलीयते ।। 'राजन्! इस प्रकार देवता, असुर और मनुष्योंसहित समस्त संसारका मुझसे ही जन्म और मुझमें ही लय होता है' ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[चारों वर्णोंके कर्म और उनके फलोंका वर्णन तथा धर्मकी वृद्धि और पापके क्षय होनेका उपाय]
[चारों वर्णोंके कर्म और उनके फलोंका वर्णन तथा धर्मकी वृद्धि और पापके क्षय होनेका उपाय]
वैशम्पायन उवाच
एवमात्मोद्भवं सर्वं जगदुद्दिश्य केशवः ।
धर्मान् धर्मात्मजस्याथ पुण्यानकथयत् प्रभुः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने सम्पूर्ण जगत्को अपनेसे उत्पन्न बतलाकर धर्मनन्दन युधिष्ठिरसे पवित्र धर्मोंका इस प्रकार वर्णन आरम्भ किया— ॥
शृणु पाण्डव तत्त्वेन पवित्रं पापनाशनम् ।
कथ्यमानं मया पुण्यं धर्मशास्त्रफलं महत् ॥
‘पाण्डुनन्दन! मेरे द्वारा कहे हुए धर्मशास्त्रका पुण्यमय, पापनाशक, पवित्र और महान् फल यथार्थ-रूपसे सुनो ॥
यः शृणोति शुचिर्भूत्वा एकचित्तस्तपोयुतः ।
स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं धर्मं ज्ञेयं युधिष्ठिर ॥
श्रद्दधानस्य तस्येह यत् पापं पूर्वसंचितम् ।
विनश्यत्याशु तत् सर्वं मद्भक्तस्य विशेषतः ॥
‘युधिष्ठिर! जो मनुष्य पवित्र और एकाग्रचित्त होकर तपस्यामें संलग्न हो स्वर्ग, यश और आयु प्रदान करनेवाले जाननेयोग्य धर्मका श्रवण करता है, उस श्रद्धालु पुरुषके—विशेषतः मेरे भक्तके पूर्वसंचित जितने पाप होते हैं, वे सब तत्काल नष्ट हो जाते हैं’ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं श्रुत्वा वचः पुण्यं सत्यं केशवभाषितम् ।
प्रहृष्टमनसो भूत्वा चिन्तयन्तोऽद्भुतं परम् ॥
देवब्रह्मर्षयः सर्वे गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।
भूता यक्षग्रहाश्चैव गुह्यका भुजगास्तथा ॥
बालखिल्या महात्मानो योगिनस्तत्त्वदर्शिनः ।
तथा भागवताश्चापि पञ्चकालमुपासकाः ॥
कौतूहलसमाविष्टाः प्रहृष्टेन्द्रियमानसाः ।
श्रोतुकामाः परं धर्मं वैष्णवं धर्मशासनम् ।
हृदि कर्तुं च तद्वाक्यं प्रणेमुः शिरसा नताः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! श्रीकृष्णका यह परम पवित्र और सत्य वचन सुनकर मन-ही-मन प्रसन्न हो धर्मके अद्भुत रहस्यका चिन्तन करते हुए सम्पूर्ण देवर्षि, ब्रह्मर्षि, गन्धर्व, अप्सराएँ, भूत, यक्ष, ग्रह, गुह्यक, सर्प, महात्मा बालखिल्यगण, तत्त्वदर्शी
योगी तथा पाँचों उपासना करनेवाले भगवद्भक्त पुरुष उत्तम वैष्णव-धर्मका उपदेश सुनने तथा भगवान्की बात हृदयमें धारण करनेके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित होकर वहाँ आये। उनके इन्द्रिय और मन अत्यन्त हर्षित हो रहे थे। आनेके बाद उन सबने मस्तक झुकाकर भगवान्को प्रणाम किया॥
ततस्तान् वासुदेवेन दृष्टान् दिव्येन चक्षुषा।
विमुक्तपापानालोक्य प्रणम्य शिरसा हरिम्।
पप्रच्छ केशवं धर्मं धर्मपुत्रः प्रतापवान्॥
भगवान्की दिव्य दृष्टि पड़नेसे वे सब निष्पाप हो गये। उन्हें उपस्थित देखकर महाप्रतापी धर्मपुत्र युधिष्ठिरने भगवान्को प्रणाम करके इस प्रकार धर्मविषयक प्रश्न किया॥
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशी ब्राह्मणस्याथ क्षत्रियस्यापि कीदृशी।
वैश्यस्य कीदृशी देव गतिः शूद्रस्य कीदृशी॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**देवेश्वर! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रकी पृथक्-पृथक् कैसी गति होती है?॥
श्रीभगवानुवाच
शृणु वर्णक्रमेणैव धर्मं धर्मभृतां वर।
नास्ति किंचिन्नरश्रेष्ठ ब्राह्मणस्य तु दुष्कृतम्॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**नरश्रेष्ठ धर्मराज! ब्राह्मणादि वर्णोंके क्रमसे धर्मका वर्णन सुनो। ब्राह्मणके लिये कुछ भी दुष्कर नहीं है॥
शिखायज्ञोपवीता ये संध्यां ये चाप्युपासते।
यैश्च पूर्णाहुतिः प्राप्ता विधिवज्जुह्वते च ये॥
वैश्वदेवं च ये चक्रुः पूजयन्त्यतिथींश्च ये।
नित्यं स्वाध्यायशीलाश्च जपयज्ञपराश्च ये॥
सायं प्रातर्हुताशाश्च शूद्रभोजनवर्जिताः।
दम्भानृतविमुक्ताश्च स्वदारनिरताश्च ये।
पञ्चयज्ञपरा ये च येऽग्निहोत्रमुपासते॥
दहन्ति दुष्कृतं येषां हूयमानास्त्रयोऽग्नयः।
नष्टदुष्कृतकर्माणो ब्रह्मलोकं व्रजन्ति ते॥
जो ब्राह्मण शिखा और यज्ञोपवीत धारण करते हैं, संध्योपासना करते हैं, पूर्णाहुति देते हैं, विधिवत् अग्निहोत्र करते हैं, बलिवैश्वदेव और अतिथियोंका पूजन करते हैं, नित्य स्वाध्यायमें लगे रहते हैं तथा जप-यज्ञके परायण हैं; जो प्रातःकाल और सायंकाल होम
करनेके बाद ही अन्न ग्रहण करते हैं, शूद्रका अन्न नहीं खाते हैं, दम्भ और मिथ्याभाषणसे दूर रहते हैं, अपनी ही स्त्रीसे प्रेम रखते हैं तथा पञ्चयज्ञ और अग्निहोत्र करते रहते हैं, जिनके सब पापोंको हवन की जानेवाली तीनों अग्नियाँ भस्म कर देती हैं, वे ब्राह्मण पापरहित होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं ॥ क्षत्रियोऽपि स्थितो राज्ये स्वधर्मपरिपालकः । सम्यक् प्रजापालयिता षड्भागनिरतः सदा ॥ यज्ञदानरतो धीरः स्वदारनिरतः सदा । शास्त्रानुसारी तत्त्वज्ञः प्रजाकार्यपरायणः ॥ विप्रेभ्यः कामदो नित्यं भृत्यानां भरणे रतः । सत्यसन्धः शुचिर्नित्यं लोभदम्भविवर्जितः । क्षत्रियोऽप्युत्तमां याति गतिं देवनिषेविताम् ॥ क्षत्रियमें भी जो राज्यसिंहासनपर आसीन होनेके बाद अपने धर्मका पालन और प्रजाकी भलीभाँति रक्षा करता है, लगानके रूपमें प्रजाकी आमदनीका छठा भाग लेकर सदा उतनेसे ही संतोष करता है, यज्ञ और दान करता रहता है, धैर्य रखता है, अपनी स्त्रीसे संतुष्ट रहता है, शास्त्रके अनुसार चलता है, तत्त्वको जानता है और प्रजाकी भलाईके कार्यमें संलग्न रहता है तथा ब्राह्मणोंकी इच्छा पूर्ण करता है, पोष्यवर्गके पालनमें तत्पर रहता है, प्रतिज्ञाको सत्य करके दिखाता है, सदा पवित्र रहता है एवं लोभ और दम्भको त्याग देता है, उस क्षत्रियको भी देवताओंद्वारा सेवित उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है ॥ कृषिगोपालनिरतो धर्मान्वेषणतत्परः । दानधर्मेऽपि निरतो विप्रशुश्रूषकस्तथा । सत्यसंधः शुचिर्नित्यं लोभदम्भविवर्जितः । ऋजुः स्वदारनिरतो हिंसाद्रोहविवर्जितः ॥ वणिग्धर्मान्न मुञ्चन् वै देवब्राह्मणपूजकः । वैश्यः स्वर्गतिमाप्नोति पूज्यमानोऽप्सरोगणैः ॥ जो वैश्य कृषि और गोपालनमें लगा रहता है, धर्मका अनुसंधान किया करता है, दान, धर्म और ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहता है तथा सत्यप्रतिज्ञ, नित्य पवित्र, लोभ और दम्भसे रहित, सरल, अपनी ही स्त्रीसे प्रेम रखनेवाला और हिंसा-द्रोहसे दूर रहनेवाला है, जो कभी भी वैश्यधर्मका त्याग नहीं करता और देवता तथा ब्राह्मणोंकी पूजामें लगा रहता है, वह अप्सराओंसे सम्मानित होकर स्वर्गलोकमें गमन करता है ॥ त्रयाणामपि वर्णानां शुश्रूषानिरतः सदा । विशेषतस्तु विप्राणां दासवद् यस्तु तिष्ठति ॥ अयाचितप्रदाता च सत्यशौचसमन्वितः । गुरुदेवार्चनरतः परदारविवर्जितः ॥
परपीडामकृत्वैव भृत्यवर्गं बिभर्ति यः ।
शूद्रोऽपि स्वर्गमाप्नोति जीवानांमभयप्रदः ॥
शूद्रोंमेंसे जो सदा तीनों वर्णोंकी सेवा करता और विशेषतः ब्राह्मणोंकी सेवामें दासकी भाँति खड़ा रहता है; जो बिना माँगे ही दान देता है, सत्य और शौचका पालन करता है, गुरु और देवताओंकी पूजामें प्रेम रखता है, परस्त्रीके संसर्गसे दूर रहता है, दूसरोंको कष्ट न पहुँचाकर अपने कुटुम्बका पालन-पोषण करता है और सब जीवोंको अभय-दान कर देता है, उस शूद्रको भी स्वर्गकी प्राप्ति होती है ॥
एवं धर्मात् परं नास्ति महत्संसारमोक्षणम् ।
न च धर्मात्परं किंचित् पापकर्मव्यपोहनम् ॥
इस प्रकार धर्मसे बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है। वही निष्कामभावसे आचरण करनेपर संसार-बन्धनसे मुक्ति दिलाता है। धर्मसे बढ़कर पाप-नाशका और कोई उपाय नहीं है ॥
तस्माद् धर्मः सदा कार्यो मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् ।
न हि धर्मानुरक्तानां लोके किंचन दुर्लभम् ॥
इसलिये इस दुर्लभ मनुष्य-जीवनको पाकर सदा धर्मका पालन करते रहना चाहिये। धर्मानुरागी पुरुषोंके लिये संसारमें कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है ॥
स्वयम्भूविहितो धर्मो यो यस्येह नरेश्वर ।
स तेन क्षपयेत् पापं सम्यगाचरितेन च ॥
नरेश्वर! ब्रह्माजीने इस जगत्में जिस वर्णके लिये जैसे धर्मका विधान किया है, वह वैसे ही धर्मका भलीभाँति आचरण करके अपने पापोंको नष्ट कर सकता है ॥
सहजं यद् भवेत् कर्म न तत् त्याज्यं हि केनचित् ।
स एव तस्य धर्मो हि तेन सिद्धिं स गच्छति ॥
मनुष्यका जो जातिगत कर्म हो, उसका किसीको त्याग नहीं करना चाहिये। वही उसके लिये धर्म होता है और उसीका निष्काम भावसे आचरण करनेपर मनुष्यको सिद्धि (मुक्ति) प्राप्त हो जाती है ॥
विगुणोऽपि स्वधर्मस्तु पापकर्म व्यपोहति ।
एवमेव तु धर्मोऽपि क्षीयते पापवर्धनात् ॥
अपना धर्म गुणरहित होनेपर भी पापको नष्ट करता है। इसी प्रकार यदि मनुष्यके पापकी वृद्धि होती है तो वह उसके धर्मको क्षीण कर डालता है ॥
युधिष्ठिर उवाच
भगवन् देवदेवेश श्रोतुं कौतूहलं हि मे ।
शुभस्याप्यशुभस्यापि क्षयवृद्धी यथाक्रमम् ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! शुभ और अशुभकी वृद्धि और ह्रास क्रमसे किस प्रकार होते हैं, इसे सुननेकी मेरी बड़ी उत्कण्ठा है॥
श्रीभगवानुवाच
शृणु पार्थिव तत्सर्वं धर्मसूक्ष्मं सनातनम् ।
दुर्विज्ञेयतमं नित्यं यत्र मग्ना महाजनाः ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**राजन्! तुमने जो धर्मका तत्त्व पूछा है, वह सूक्ष्म, सनातन, अत्यन्त दुर्विज्ञेय और नित्य है, बड़े-बड़े लोग भी उसमें मग्न हो जाते हैं, वह सब तुम सुनो॥
यथैव शीतमुदकमुष्णेन बहुना वृतम् ।
भवेत्तु तत्क्षणादुष्णं शीतत्वं च विनश्यति ॥
जिस प्रकार थोड़े-से ठंडे जलको बहुत गरम जलमें मिला दिया जाता है तो वह तत्क्षण गरम हो जाता है और उसका ठंडापन नष्ट हो जाता है॥
यथोष्णं वा भवेदल्पं शीतेन बहुना वृतम् ।
शीतलं च भवेत् सर्वमुष्णत्वं च विनश्यति ॥
जब थोड़ा-सा गरम जल बहुत शीतल जलमें मिला दिया जाता है, तब वह सब-का-सब शीतल हो जाता है और उसकी उष्णता नष्ट हो जाती है॥
एवं च यद् भवेद् भूरि सुकृतं वापि दुष्कृतम् ।
तदल्पं क्षपयेच्छीघ्रं नाज कार्या विचारणा ॥
इसी प्रकार जो पुण्य या पाप बहुत अधिक होता है, वह थोड़े पाप-पुण्यको शीघ्र ही नष्ट कर देता है, इसमें कोई संशय नहीं है॥
समत्वे सति राजेन्द्र तयोः सुकृतपापयोः ।
गूहितस्य भवेद् वृद्धिः कीर्तितस्य भवेत् क्षयः ॥
राजेन्द्र! जब वे पुण्य-पाप दोनों समान होते हैं, तब जिसको गुप्त रखा जाता है, उसकी वृद्धि होती है और जिसका वर्णन कर दिया जाता है, उसका क्षय हो जाता है॥
ख्यापनेनानुतापेन प्रायः पापं विनश्यति ।
तथा कृतस्तु राजेन्द्र धर्मो नश्यति मानद ॥
सम्मान देनेवाले नरेश्वर! पापको दूसरोंसे कहने और उसके लिये पश्चात्ताप करनेसे प्रायः उसका नाश हो जाता है। इसी प्रकार धर्म भी अपने मुँहसे दूसरोंके सम्मुख प्रकट करनेपर नष्ट होता है॥
तावुभौ गूहितौ सम्यग् वृद्धिं यातो न संशयः ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन न पापं गूहयेद् बुधः ॥
तस्मादेतत् प्रयत्नेन कीर्तयेत् क्षयकारणात् ॥
तस्मात् संकीर्तयेत् पापं नित्यं धर्मं च गूहयेत् ॥
छिपानेपर निःसंदेह ये दोनों ही अधिक बढ़ते हैं। इसलिये समझदार मनुष्यको चाहिये कि सर्वथा उद्योग करके अपने पापको प्रकट कर दे, उसे छिपानेकी कोशिश न करे। पापका कीर्तन पापके नाशका कारण होता है, इसलिये हमेशा पापको प्रकट करना और धर्मको गुप्त रखना चाहिये ॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)