भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2071, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2071

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[युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन]

जनमेजय उवाच

अश्वमेधे पुरा वृत्ते केशवं केशिसूदनम् ।
धर्मसंशयमुद्दिश्य किमपृच्छत् पितामहः ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! पूर्वकालमें जब मेरे पितामह महाराज युधिष्ठिरका अश्वमेध-यज्ञ पूर्ण हो गया, तब उन्होंने धर्मके विषयमें संदेह होनेपर भगवान् श्रीकृष्णसे कौन-सा प्रश्न किया? ।।

वैशम्पायन उवाच

पश्चिमेनाश्वमेधेन यदा स्नातो युधिष्ठिरः ।
तदा राजा नमस्कृत्य केशवं पुनरब्रवीत् ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! अश्वमेध-यज्ञके बाद जब धर्मराज युधिष्ठिरने अवभृथ-स्नान कर लिया, तब भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम करके इस प्रकार पूछना आरम्भ किया ।।

वशिष्ठाद्यास्तपोयुक्ता मुनयस्तत्त्वदर्शिनः ।
श्रोतुकामाः परं गुह्यं वैष्णवं धर्ममुत्तमम् ।
तथा भागवताश्चैव ततस्तं पर्यवारयन् ॥
उस समय वसिष्ठ आदि तत्त्वदर्शी तपस्वी मुनिगण तथा अन्य भक्तगण उस परम गोपनीय उत्तम वैष्णव-धर्मको सुननेकी इच्छासे भगवान् श्रीकृष्णको घेरकर बैठ गये ।।

युधिष्ठिर उवाच

तत्त्वतस्तव भावेन पादमूलमुपागतम् ।
यदि जानासि मां भक्तं स्निग्धं वा भक्तवत्सल ॥
धर्मगुह्यानि सर्वाणि वेत्तुमिच्छामि तत्त्वतः ।
धर्मान् कथय मे देव यद्यनुग्रहभागहम् ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भक्तवत्सल! मैं सच्चे भक्तिभावसे आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ। भगवन्! यदि आप मुझे अपना प्रेमी या भक्त समझते हैं और यदि मैं आपके अनुग्रहका अधिकारी होऊँ तो मुझसे वैष्णव-धर्मोंका वर्णन कीजिये। मैं उनके सम्पूर्ण रहस्योंको यथार्थ रूपसे जानना चाहता हूँ ।।

श्रुता मे मानवा धर्मा वाशिष्ठाः काश्यपास्तथा ।
गार्गीया गौतमीयाश्च तथा गोपालकस्य च ॥
पराशरकृताः पूर्वा मैत्रेयस्य च धीमतः ।