महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2072, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔमा माहेश्वराश्चैव नन्दिधर्माश्च पावनाः ।। मैंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, गोपालक, पराशर, बुद्धिमान् मैत्रेय, उमा, महेश्वर और नन्दिद्वारा कहे हुए पवित्र धर्मोंका श्रवण किया है ।। ब्रह्मणा कथिता ये च कौमाराश्च श्रुता मया । धूमायनकृता धर्माः काण्डवैश्वानरा अपि ।। भार्गवा याज्ञवल्क्याश्च मार्कण्डेयकृता अपि । भारद्वाजकृता ये च बृहस्पतिकृताश्च ये ।। कुणेश्च कुणिबाहोश्च विश्वामित्रकृताश्च ये । सुमन्तुजैमिनिकृताः शाकुनेयास्तथैव च ।। पुलस्त्यपुलहोद्गीताः पावकीयास्तथैव च । अगस्त्यगीता मौद्गल्याः शाण्डिल्याः शलभायनाः ।। बालखिल्यकृता ये च ये च सप्तर्षिभिस्तथा । आपस्तम्बकृता धर्माः शंखस्य लिखितस्य च ।। प्राजापत्यास्तथा याम्या माहेन्द्राश्च श्रुता मया । वैयाघ्रव्यासकीयाश्च विभाण्डककृताश्च ये ।। तथा जो ब्रह्मा, कार्तिकेय, धूमायन, काण्ड, वैश्वानर, भार्गव, याज्ञवल्क्य और मार्कण्डेयके द्वारा भी कहे गये हैं एवं जो भरद्वाज और बृहस्पतिके बनाये हुए हैं तथा जो कुणि, कुणिबाहु, विश्वामित्र, सुमन्तु, जैमिनि, शकुनि, पुलस्त्य, पुलह, अग्नि, अगस्त्य, मुद्गल, शाण्डिल्य, शलभ, बालखिल्यगण, सप्तर्षि, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, प्रजापति, यम, महेन्द्र, व्याघ्र, व्यास और विभाण्डकके द्वारा कहे गये हैं, उनको भी मैंने सुना है ।। नारदीयाः श्रुता धर्माः कापोताश्च श्रुता मया । तथा विदुरवाक्यानि भृगोरङ्गिरसस्तथा ।। क्रौञ्चा मृदङ्गगीताश्च सौर्या हारीतकाश्च ये । ये पिशङ्गकृताश्चापि कापोतीयाः सुबालकाः ।। उद्दालककृता धर्मा औशनस्यास्तथैव च । वैशम्पायनगीताश्च ये चान्येऽप्येवमादितः ।। एवं जो नारद, कपोत, विदुर, भृगु, अंगिरा, क्रौंच, मृदंग, सूर्य, हारीत, पिशंग, कपोत, सुबालक, उद्दालक, शुक्राचार्य, वैशम्पायन तथा दूसरे-दूसरे महात्माओंके द्वारा बताये हुए हैं, उन धर्मोंका भी मैंने आद्योपान्त श्रवण किया है ।। एतेभ्यः सर्वधर्मेभ्यो देव त्वन्मुखनिःसृताः । पावनत्वात् पवित्रत्वाद् विशिष्टा इति मे मतिः ।। परन्तु भगवन्! मुझे विश्वास है कि आपके मुखसे जो धर्म प्रकट हुए हैं, वे पवित्र और पावन होनेके कारण उपर्युक्त सभी धर्मोंसे श्रेष्ठ हैं ।।