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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2047, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2047

तुम्हारा सत्तू लेता हूँ ॥ ६४ ॥ इत्युक्त्वाऽऽदाय तान् सक्तून् प्रीतात्मा द्विजसत्तमः । प्रहसन्निव विप्राय स तस्मै प्रददौ तदा ॥ ६५ ॥ यों कहकर श्रेष्ठ ब्राह्मणने प्रसन्नतापूर्वक वह सत्तू ले लिया और हँसते हुए-से उस ब्राह्मण अतिथिको परोस दिया ॥ ६५ ॥ भुक्त्वा तानपि सक्तून् स नैव तृप्तो बभूव ह । उञ्छवृत्तिस्तु धर्मात्मा व्रीडामनुजगाम ह ॥ ६६ ॥ वह सत्तू खाकर भी ब्राह्मण देवताका पेट न भरा। यह देखकर उञ्छवृत्तिधारी धर्मात्मा ब्राह्मण बड़े संकोचमें पड़ गये ॥ ६६ ॥ तं वै वधूः स्थिता साध्वी ब्राह्मणप्रियकाम्यया । सक्तूनादाय संहृष्टा श्वशुरं वाक्यमब्रवीत् ॥ ६७ ॥ उनकी पुत्रवधू भी बड़ी सुशीला थी। वह ब्राह्मणका प्रिय करनेकी इच्छासे उनके पास जा बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने उन श्वशुरदेवसे बोली— ॥ ६७ ॥ संतानात् तव संतानं मम विप्र भविष्यति । सक्तूनिमानतिथये गृहीत्वा संप्रयच्छ मे ॥ ६८ ॥ 'विप्रवर! आपकी संतानसे मुझे संतान प्राप्त होगी; अतः आप मेरे परम पूज्य हैं। मेरे हिस्सेका यह सत्तू लेकर आप अतिथि देवताको अर्पित कीजिये ॥ ६८ ॥ तव प्रसादान्निर्वृत्ता मम लोकाः किलाक्षयाः । पुत्रेण तानवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति ॥ ६९ ॥ 'आपकी कृपासे मुझे अक्षय लोक प्राप्त हो गये। पुत्रके द्वारा मनुष्य उन लोकोंमें जाते हैं, जहाँ जाकर वह कभी शोकमें नहीं पड़ता ॥ ६९ ॥ धर्माद्या हि यथा त्रेता वह्नित्रेता तथैव च । तथैव पुत्रपौत्राणां स्वर्गस्त्रेता किलाक्षयः ॥ ७० ॥ 'जैसे धर्म तथा उससे संयुक्त अर्थ और काम—ये तीनों स्वर्गके प्राप्ति करानेवाले हैं तथा जैसे आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि—ये तीनों स्वर्गके साधन हैं, उसी प्रकार पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र—ये त्रिविध संतानें अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाली हैं ॥ ७० ॥ पितॄन् ऋणात् तारयति पुत्र इत्यनुशुश्रुम । पुत्रपौत्रैश्च नियतं साधुलोकानुपाश्नुते ॥ ७१ ॥ 'हमने सुना है कि पुत्र पिताको पितृ-ऋणसे छुटकारा दिला देता है। पुत्रों और पौत्रोंके द्वारा मनुष्य निश्चय ही श्रेष्ठ लोकोंमें जाते हैं' ॥ ७१ ॥

श्वशुर उवाच वातातपविशीर्णाङ्गीं त्वां विवर्णां निरीक्ष्य वै ।

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