भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2046, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2046

पुत्र होनेका यही फल है कि वह वृद्धावस्थामें पिताकी रक्षा करे। ब्रह्मर्षे! तीनों लोकोंमें यह सनातन श्रुति प्रसिद्ध है ॥ ५८ ॥
प्राणधारणमात्रेण शक्यं कर्तुं तपस्त्वया ।
प्राणो हि परमो धर्मः स्थितो देहेषु देहिनाम् ॥ ५९ ॥
प्राणधारणमात्रसे आप तप कर सकते हैं। देहधारियोंके शरीरोंमें स्थित हुआ प्राण ही परम धर्म है ॥ ५९ ॥

पितोवाच

अपि वर्षसहस्री त्वं बाल एव मतो मम ।
उत्पाद्य पुत्रं हि पिता कृतकृत्यो भवेत् सुतात् ॥ ६० ॥
पिताने कहा— बेटा! तुम हजार वर्षके हो जाओ तो भी हमारे लिये बालक ही हो। पिता पुत्रको जन्म देकर ही उससे अपनेको कृतकृत्य मानता है ॥ ६० ॥
बालानां क्षुद् बलवती जानाम्येतदहं प्रभो ।
वृद्धोऽहं धारयिष्यामि त्वं बली भव पुत्रक ॥ ६१ ॥
सामर्थ्यशाली पुत्र! मैं इस बातको अच्छी तरह जानता हूँ कि बच्चोंकी भूख बड़ी प्रबल होती है। मैं तो बूढ़ा हूँ। भूखे रहकर भी प्राण धारण कर सकता हूँ। तुम यह सत्तू खाकर बलवान् होओ—अपने प्राणोंकी रक्षा करो ॥ ६१ ॥
जीर्णेन वयसा पुत्र न मां क्षुद् बाधतेऽपि च ।
दीर्घकालं तपस्तप्तं न मे मरणतो भयम् ॥ ६२ ॥
बेटा! जीर्ण अवस्था हो जानेके कारण मुझे भूख अधिक कष्ट नहीं देती है। इसके सिवा मैं दीर्घकालतक तपस्या कर चुका हूँ; इसलिये अब मुझे मरनेका भय नहीं है ॥ ६२ ॥

पुत्र उवाच

अपत्यमस्मि ते पुंसस्त्राणात् पुत्र इति स्मृतः ।
आत्मा पुत्रः स्मृतस्तस्मात् त्राह्यात्मानमिहात्मना ॥ ६३ ॥
पुत्र बोला— तात! मैं आपका पुत्र हूँ, पुरुषका त्राण करनेके कारण ही संतानको पुत्र कहा गया है। इसके सिवा पुत्र पिताका अपना ही आत्मा माना गया है; अतः आप अपने आत्मभूत पुत्रके द्वारा अपनी रक्षा कीजिये ॥ ६३ ॥

पितोवाच

रूपेण सदृशस्त्वं मे शीलेन च दमेन च ।
परीक्षितश्च बहुधा सक्तूनादत्स्व ते सुत ॥ ६४ ॥
पिताने कहा— बेटा! तुम रूप, शील (सदाचार और सद्भाव) तथा इन्द्रियसंयमके द्वारा मेरे ही समान हो। तुम्हारे इन गुणोंकी मैंने अनेक बार परीक्षा कर ली है, अतः मैं