महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतमुञ्छवृत्तिरालक्ष्य ततश्चिन्तापरोऽभवत् ।। ५५ ।।
अतिथि ब्राह्मण उस सत्तूको भी लेकर खा गया; किंतु संतुष्ट नहीं हुआ। यह देखकर उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणको बड़ी चिन्ता हुई ।। ५५ ।।
पुत्र उवाच
सक्तूनिमान् प्रगृह्य त्वं देहि विप्राय सत्तम ।
इत्येव सुकृतं मन्ये तस्मादेतत् करोम्यहम् ।। ५६ ।।
**तब उनके पुत्रने कहा—**सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पिताजी! आप मेरे हिस्सेका यह सत्तू लेकर ब्राह्मणको दे दीजिये। मैं इसीमें पुण्य मानता हूँ, इसलिये ऐसा कर रहा हूँ ।। ५६ ।।
भवान् हि परिपाल्यो मे सर्वदैव प्रयत्नतः ।
साधूनां काङ्क्षितं यस्मात् पितुर्वृद्धस्य पालनम् ।। ५७ ।।
मुझे सदा यत्नपूर्वक आपका पालन करना चाहिये; क्योंकि साधु पुरुष सदा इस बातकी अभिलाषा रखते हैं कि मैं अपने बूढ़े पिताका पालन-पोषण करूँ ।। ५७ ।।
पुत्रार्थो विहितो ह्येष वार्धके परिपालनम् ।
श्रुतिरेषा हि विप्रर्षे त्रिषु लोकेषु शाश्वती ।। ५८ ।।