भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2031, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2031

ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् साधु साध्विति भारत ।। १५ ।।
तथैव द्विजसंघानां शंसतां विबभौ स्वनः ।
भारत! उस समय आकाशवाणी हुई—'पाण्डवो! तुमने बहुत अच्छा निश्चय किया। तुम्हें धन्यवाद!' इसी प्रकार पाण्डवोंके सत्साहसकी प्रशंसा करते हुए ब्राह्मण-समूहोंका भी शब्द वहाँ स्पष्ट सुनायी दे रहा था ।। १५ १/२ ।।

द्वैपायनस्तथा कृष्णः पुनरेव युधिष्ठिरम् ।। १६ ।।
प्रोवाच मध्ये विप्राणामिदं सम्पूजयन् मुनिः ।
तब मुनिवर द्वैपायनकृष्णने पुनः ब्राह्मणोंके बीचमें युधिष्ठिरकी प्रशंसा करते हुए कहा— ।। १६ १/२ ।।

दत्तैषा भवता मह्यं तां ते प्रतिददाम्यहम् ।। १७ ।।
हिरण्यं दीयतामेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो धरास्तु ते ।
'राजन्! तुमने तो यह पृथ्वी मुझे दे ही दी। अब मैं अपनी ओरसे इसे वापस करता हूँ। तुम इन ब्राह्मणोंको सुवर्ण दे दो और पृथ्वी तुम्हारे ही अधिकारमें रह जाय' ।। १७ १/२ ।।

ततोऽब्रवीद् वासुदेवो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।। १८ ।।
यथाऽऽह भगवान् व्यासस्तथा त्वं कर्तुमर्हसि ।
तब भगवान् श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा—'धर्मराज! भगवान् व्यास जैसा कहते हैं, वैसा ही तुम्हें करना चाहिये' ।। १८ १/२ ।।

इत्युक्तः स कुरुश्रेष्ठः प्रीतात्मा भ्रातृभिः सह ।। १९ ।।
कोटिकोटिकृतां प्रादाद् दक्षिणां त्रिगुणां क्रतोः ।
यह सुनकर कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर भाइयोंसहित बहुत प्रसन्न हुए और प्रत्येक ब्राह्मणोंको उन्होंने यज्ञके लिये एक-एक करोड़की तिगुनी दक्षिणा दी ।। १९ १/२ ।।

न करिष्यति तल्लोके कश्चिदन्यो नराधिपः ।। २० ।।
यत् कृतं कुरुराजेन मरुत्तस्यानुकुर्वता ।
महाराज मरुत्तके मार्गका अनुसरण करनेवाले राजा युधिष्ठिरने उस समय जैसा महान् त्याग किया था, वैसा इस संसारमें दूसरा कोई राजा नहीं कर सकेगा ।। २० १/२ ।।

प्रतिगृह्य तु तद् रत्नं कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।। २१ ।।
ऋत्विग्भ्यः प्रददौ विद्वांश्चतुर्धा व्यभजंश्च ते ।
विद्वान् महर्षि व्यासने वह सुवर्णराशि लेकर ब्राह्मणोंको दे दी और उन्होंने चार भाग करके उसे आपसमें बाँट लिया ।। २१ १/२ ।।

धरण्या निष्क्रयं दत्त्वा तद्धिरणयं युधिष्ठिरः ।। २२ ।।
धूतपापो जितस्वर्गो मुमुदे भ्रातृभिः सह ।