भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2030, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2030

ततो युधिष्ठिरः प्रादाद् ब्राह्मणेभ्ये यथाविधि ॥ ७ ॥
कोटीः सहस्रं निष्काणां व्यासाय तु वसुंधराम् ।
इसके बाद युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक एक हजार करोड़ (एक खर्व) स्वर्णमुद्राएँ दक्षिणामें देकर व्यासजीको सम्पूर्ण पृथ्वी दान कर दी ॥ ७ १/२ ॥
प्रतिगृह्य धरां राजन् व्यासः सत्यवतीसुतः ॥ ८ ॥
अब्रवीद् भरतश्रेष्ठं धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
राजन्! सत्यवतीनन्दन व्यासने उस भूमिदानको ग्रहण करके भरतश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ८ १/२ ॥
वसुधा भवतस्त्वेषा संन्यस्ता राजसत्तम ॥ ९ ॥
निष्क्रयो दीयतां मह्यं ब्राह्मणा हि धनार्थिनः ।
‘नृपश्रेष्ठ! तुम्हारी दी हुई इस पृथ्वीको मैं पुनः तुम्हारे ही अधिकारमें छोड़ता हूँ। तुम मुझे इसका मूल्य दे दो; क्योंकि ब्राह्मण धनके ही इच्छुक होते हैं (राज्यके नहीं)’ ॥ ९ १/२ ॥
युधिष्ठिरस्तु तान् विप्रान् प्रत्युवाच महामनाः ॥ १० ॥
भ्रातृभिः सहितो धीमान् मध्ये राज्ञां महात्मनाम् ।
तब महामनस्वी नरेशोंके बीचमें भाइयोंसहित बुद्धिमान् महामना युधिष्ठिरने उन ब्राह्मणोंसे कहा— ॥ १० १/२ ॥
अश्वमेधे महायज्ञे पृथिवी दक्षिणा स्मृता ॥ ११ ॥
अर्जुनेन जिता चेयमृत्विग्भ्यः प्रापिता मया ।
वनं प्रवेक्ष्ये विप्राग्र्या विभजध्वं महीमिमाम् ॥ १२ ॥
चतुर्धा पृथिवीं कृत्वा चातुर्होत्रप्रमाणतः ।
नाहमादातुमिच्छामि ब्रह्मस्वं द्विजसत्तमाः ॥ १३ ॥
इदं नित्यं मनो विप्रा भ्रातॄणां चैव मे सदा ।
‘विप्रवरो! अश्वमेध नामक महायज्ञमें पृथ्वीकी दक्षिणा देनेका विधान है; अतः अर्जुनके द्वारा जीती हुई यह सारी पृथ्वी मैंने ऋत्विजोंको दे दी है। अब मैं वनमें चला जाऊँगा। आपलोग चातुर्होत्र यज्ञके प्रमाणानुसार पृथ्वीके चार भाग करके इसे आपसमें बाँट लें। द्विजश्रेष्ठगण! मैं ब्राह्मणोंका धन लेना नहीं चाहता। ब्राह्मणो! मेरे भाइयोंका भी सदा ऐसा ही विचार रहता है’ ॥ ११—१३ १/२ ॥
इत्युक्तवति तस्मिंस्तु भ्रातरो द्रौपदी च सा ॥ १४ ॥
एवमेतदिति प्राहुस्तदभूल्लोमहर्षणम् ।
उनके ऐसा कहनेपर भीमसेन आदि भाइयों और द्रौपदीने एक स्वरसे कहा—‘हाँ, महाराजका कहना ठीक है।’ इस महान् त्यागकी बात सुनकर सबके रोंगटे खड़े हो गये ॥ १४ १/२ ॥