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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 204

कुमार स्कन्द मोरपर चढ़कर हाथमें शक्ति और घंटा लिये पार्वतीदेवीके पास ही खड़े थे। वे दूसरे अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे।। २७८।।

पुरस्ताच्चैव देवस्य नन्दिं पश्याम्यवस्थितम्।
शूलं विष्टभ्य तिष्ठन्तं द्वितीयमिव शंकरम्।। २७९।।
महादेवजीके आगे मैंने नन्दीको उपस्थित देखा, जो शूल उठाये दूसरे शंकरके समान खड़े थे।। २७९।।

स्वायम्भुवाद्या मनवो भृग्वाद्या ऋषयस्तथा।
शक्राद्या देवताश्चैव सर्व एव समभ्ययुः।। २८०।।
स्वायम्भुव आदि मनु, भृगु आदि ऋषि तथा इन्द्र आदि देवता—ये सभी वहाँ पधारे थे।। २८०।।

सर्वभूतगणाश्चैव मातरो विविधाः स्थिताः।
तेऽभिवाद्य महात्मानं परिवार्य समन्ततः।। २८१।।
अस्तुवन् विविधैः स्तोत्रैर्महादेवं सुरास्तदा।
समस्त भूतगण और नाना प्रकारकी मातृकाएँ उपस्थित थीं। वे सब देवता महात्मा महादेवजीको चारों ओरसे घेरकर नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति कर रहे थे।। २८१ १/२।।

ब्रह्मा भवं तदास्तौषीद् रथन्तरमुदीरयन्।। २८२।।
ज्येष्ठसाम्ना च देवेशं जगौ नारायणस्तदा।। २८३।।
ब्रह्माजीने रथन्तर सामका उच्चारण करके उस समय भगवान् शंकरकी स्तुति की। नारायणने ज्येष्ठसामद्वारा देवेश्वर शिवकी महिमाका गान किया।।

गृणन् ब्रह्म परं शक्रः शतरुद्रियमुत्तमम्।
ब्रह्मा नारायणश्चैव देवराजश्च कौशिकः।। २८४।।
अशोभन्त महात्मानस्त्रयस्त्रय इवाग्नयः।
इन्द्रने उत्तम शतरुद्रियका सस्वर पाठ करते हुए परब्रह्म शिवका स्तवन किया। ब्रह्मा, नारायण और देवराज इन्द्र—ये तीनों महात्मा तीन अग्नियोंके समान शोभा पा रहे थे।। २८४ १/२।।

तेषां मध्यगतो देवो रराज भगवान् शिवः।। २८५।।
शरदभ्रविनिर्मुक्तः परिधिस्थ इवांशुमान्।
इन तीनोंके बीचमें विराजमान भगवान् शिव शरद्-ऋतुके बादलोंके आवरणसे मुक्त हो परिधि (घेरे)-में स्थित हुए सूर्यदेवके समान शोभा पा रहे थे।। २८५ १/२।।

अयुतानि च चन्द्रार्कानपश्यं दिवि केशव।। २८६।।
ततोऽहमस्तुवं देवं विश्वस्य जगतः पतिम्।

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