भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2088, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2088

अन्नका, झूठ बोलकर लाये हुए अन्नका, ब्राह्मणके धनका, चोरी करके लाये हुए द्रव्यका तथा कलंकी पुरुषके घरसे लाये हुए धनका दान किया गया है, जो पतित ब्राह्मणको दिया गया है, जो दान वेदविहीन पुरुषोंको और सबके यहाँ याचना करनेवालोंको दिया जाता है तथा जो संस्कारहीन पतितोंको तथा एक बार संन्यास लेकर फिर गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश करनेवाले पुरुषोंको दिया जाता है, जो दान वेश्यागामीको और ससुरालमें रहकर गुजारा करनेवाले ब्राह्मणको दिया गया है, जिस दानको समूचे गाँवसे याचना करनेवाले और कृतघ्नने ग्रहण किया है एवं जो दान उपपातकीको, वेद बेचनेवालेको, स्त्रीके वशमें रहनेवालेको, राजसेवकको, ज्योतिषीको, तान्त्रिकको, शूद्रजातिकी स्त्रीके साथ सम्बन्ध रखनेवालेको, अस्त्र-शस्त्रसे जीविका चलानेवालेको, नौकरी करनेवालेको, साँप पकड़नेवालेको और पुरोहिती करनेवालेको दिया जाता है, जिस दानको वैद्यने ग्रहण किया है, राजश्रेष्ठ! जो दान बनियेका काम करनेवालेको, क्षुद्र मन्त्र जपकर जीविका चलानेवालेको, शूद्रके यहाँ गुजारा करनेवालेको, वेतन लेकर मन्दिरमें पूजा करनेवालेको, देवोत्तर सम्पत्तिको खा जानेवालेको, तस्वीर बनानेका काम करनेवालेको, रंगभूमिमें नाच-कूदकर जीविका चलानेवालेको, मांस बेचकर जीवन-निर्वाह करनेवालेको, सेवाका काम करनेवालेको, ब्राह्मणोचित आचारसे हीन होकर भी अपनेको ब्राह्मण बतलानेवालेको, उपदेश देनेकी शक्तिसे रहितको, ब्याजखोरको, अनाचारीको, अग्निहोत्र न करनेवालेको, संध्योपासनासे अलग रहनेवालेको, शूद्रके गाँवमें निवास करनेवालेको, झूठे वेश धारण करनेवालेको, सबके साथ और सब कुछ खानेवालेको, नास्तिकको, धर्मविक्रेताको, नीच वृत्तिवालेको, झूठी गवाही देनेवालेको तथा कूटनीतिका आश्रय लेकर गाँवके लोगोंमें लड़ाई-झगड़ा करानेवाले ब्राह्मणको दिया जाता है, वह सब निष्फल होता है, इसमें कोई विचारणीय बात नहीं है ॥

विप्रनामधरा एते लोलुपा ब्राह्मणाधमाः ।
नात्मानं तारयन्त्येते न दातारं युधिष्ठिर ॥

युधिष्ठिर! ये सब विषयलोलुप, विप्रनामधारी ब्राह्मण अधम हैं, ये न तो अपना उद्धार कर सकते हैं और न दाताका ही ॥

एतेभ्यो दत्तमात्राणि दानानि सुबहून्यपि ।
वृथा भवन्ति राजेन्द्र भस्मन्याज्याहुतिर्यथा ॥

राजेन्द्र! उपर्युक्त ब्राह्मणोंको दिये हुए दान बहुत हों तो भी राखमें डाली हुई घीकी आहुतिके समान व्यर्थ हो जाते हैं ॥

एतेषु यत् फलं किंचिद् भविष्यति कथंचन ।
राक्षसाश्च पिशाचाश्च तद् विलुम्पन्ति हर्षिताः ॥

उन्हें दिये गये दानका जो कुछ फल होनेवाला होता है, उसे राक्षस और पिशाच प्रसन्नताके साथ लूट ले जाते हैं ॥