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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2090, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2090

ईर्ष्यामत्सरसंयुक्तो दम्भार्थं चार्थकारणात् । ददाति दानं यो मर्त्यो बालभावे तदश्नुते ।। ईर्ष्या और मत्सरतासे युक्त मनुष्य अर्थलोभसे और दम्भपूर्वक जिस दानको देता है, उसका फल वह बाल्यावस्थामें भोगता है ।।

भोक्तुं भोगमशक्तस्तु व्याधिभिः पीडितो भृशम् । ददाति दानं यो मर्त्यो वृद्धभावे तदश्नुते ।। भोगोंको भोगनेमें अशक्त, अत्यन्त व्याधिसे पीड़ित मनुष्य जिस दानको देता है, उसके फलका उपभोग वह वृद्धावस्थामें करता है ।।

श्रद्धायुक्तः शुचिः स्नातः प्रसन्नेन्द्रियमानसः । ददाति दानं यो मर्त्यो यौवने स तदश्नुते ।। जो मनुष्य स्नान करके पवित्र हो मन और इन्द्रियोंको प्रसन्न रखकर श्रद्धाके साथ दान करता है, उसके फलको वह यौवनावस्थामें भोगता है ।।

स्वयं नीत्वा तु यद् दानं भक्त्या पात्रे प्रदीयते । तत्सार्वकालिकं विद्धि दानमामरणान्तिकम् ।। जो स्वयं देने योग्य वस्तु ले जाकर भक्तिपूर्वक सत्पात्रको दान करता है, उसको मरणपर्यन्त हर समय उस दानका फल प्राप्त होता है, ऐसा समझो ।।

राजसं सात्त्विकं चापि तामसं च युधिष्ठिर । दानं दानफलं चैव गतिं च त्रिविधां शृणु ।। युधिष्ठिर! दान और उसका फल सात्त्विक, राजस और तामस भेदसे तीन-तीन प्रकारका होता है तथा उसकी गति भी तीन प्रकारकी होती है, इसे सुनो ।।

दानं दातव्यमित्येव मतिं कृत्वा द्विजाय वै । उपकारवियुक्ताय यद् दत्तं तद्धि सात्त्विकम् ।। दान देना कर्तव्य है—ऐसा समझकर अपना उपकार न करनेवाले ब्राह्मणको जो दान दिया जाता है, वही सात्त्विक है ।।

श्रोत्रियाय दरिद्राय बहुभृत्याय पाण्डव । दीयते यत् प्रहृष्टेन तत् सात्त्विकमुदाहृतम् ।। पाण्डुनन्दन! जिसका कुटुम्ब बहुत बड़ा हो तथा जो दरिद्र और वेदका विद्वान् हो, ऐसे ब्राह्मणको प्रसन्नतापूर्वक जो कुछ दिया जाता है, वह भी सात्त्विक कहा जाता है ।।

वेदाक्षरविहीनाय यत्तु पूर्वोपकारिणे । समृद्धाय च यद् दत्तं तद् दानं राजसं स्मृतम् ।। परंतु जो वेदका एक अक्षर भी नहीं जानता, जिसके घरमें काफी सम्पत्ति मौजूद है तथा जो पहले कभी अपना उपकार कर चुका है, ऐसे ब्राह्मणको दिया हुआ दान राजस माना गया है ।।

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 2090, कुल 2566 में से · BharatKosha