महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2091, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसम्बन्धिने च यद् दत्तं प्रमत्ताय च पाण्डव । फलार्थिभिरपात्राय तद् दानं राजसं स्मृतम् ॥ पाण्डव! अपने सम्बन्धी और प्रमादीको दिया हुआ, फलकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंके द्वारा दिया हुआ तथा अपात्रको दिया हुआ दान भी राजस ही है ॥
वैश्वदेवविहीनाय दानमश्रोत्रियाय च । दीयते तस्करायापि तद् दानं तामसं स्मृतम् ॥ जो ब्राह्मण बलिवैश्वदेव नहीं करता, वेदका ज्ञान नहीं रखता तथा चोरी किया करता है, उसको दिया हुआ दान तामस है ॥
सरोषमवधूतं च क्लेशयुक्तमवज्ञया । सेवकाय च यद् दत्तं तत् तामसमुदाहृतम् ॥ क्रोध, तिरस्कार, क्लेश और अवहेलनापूर्वक तथा सेवकको दिया हुआ दान भी तामस ही बतलाया गया है ॥
देवा पितृगणाश्चैव मुनयश्चाग्नयस्तथा । सात्त्विकं दानमश्नन्ति तुष्यन्ति च नरेश्वर ॥ नरेश्वर! सात्त्विक दानको देवता, पितर, मुनि और अग्नि ग्रहण करते हैं तथा उससे इन्हें बड़ा संतोष होता है ॥
दानवा दैत्यसंघाश्च ग्रहा यक्षाः सराक्षसाः । राजसं दानमश्नन्ति वर्जितं पितृदैवतैः ॥ राजस दानका दानव, दैत्य, ग्रह, यक्ष और राक्षस उपभोग करते हैं, पितर और देवता नहीं करते ॥
पिशाचाः प्रेतसंघाश्च कश्मला ये मलीमसाः । तामसं दानमश्नन्ति गतिं च त्रिविधां शृणु ॥ तामस दानका फल पापी और मलिन कर्म करनेवाले प्रेत एवं पिशाच भोगते हैं। अब त्रिविध गतिका वर्णन सुनो ॥
सात्त्विकानां तु दानानामुत्तमं फलमश्रुते । मध्यमं राजसानां तु तामसानां तु पश्चिमम् ॥ सात्त्विक दानोंका फल उत्तम, राजस दानोंका मध्यम और तामस दानोंका फल अधम होता है ॥
अभिगम्योपनीतानां दानानां फलमुत्तमम् । मध्यमं तु समाहूय जघन्यं याचते फलम् ॥ जो दान सामने जाकर दिया जाता है, उसका फल उत्तम होता है; जो दानपात्रको बुलाकर दिया जाता है, उसका फल मध्यम होता है और जो याचना करनेवालेको दिया जाता है, उसका फल जघन्य होता है ॥