भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 211

योगेश्वर नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वसम्भव ।
भगवन्! देव! आपको नमस्कार है। भक्तवत्सल! आपको नमस्कार है। योगेश्वर! आपको नमस्कार है। विश्वकी उत्पत्तिके कारण! आपको नमस्कार है ।। ३२७ १/२ ।।
प्रसीद मम भक्तस्य दीनस्य कृपणस्य च ।। ३२८ ।।
अनैश्वर्येण युक्तस्य गतिर्भव सनातन ।

सनातन परमेश्वर! आप मुझ दीन-दुःखी भक्तपर प्रसन्न होइये। मैं ऐश्वर्यसे रहित हूँ। आप ही मेरे आश्रयदाता हों ।। ३२८ १/२ ।।
यच्चापराधं कृतवानज्ञात्वा परमेश्वर ।। ३२९ ।।
मद्भक्त इति देवेश तत् सर्वं क्षन्तुमर्हसि ।

परमेश्वर देवेश! मैंने अनजानमें जो अपराध किये हों, वह सब यह समझकर क्षमा कीजिये कि यह मेरा अपना ही भक्त है ।। ३२९ १/२ ।।
मोहितश्चास्मि देवेश त्वया रूपविपर्ययात् ।। ३३० ।।
नार्घ्यं ते न मया दत्तं पाद्यं चापि महेश्वर ।

देवेश्वर! आपने अपना रूप बदलकर मुझे मोहमें डाल दिया। महेश्वर! इसीलिये न तो मैंने आपको अर्घ्य दिया और न पाद्य ही समर्पित किया ।। ३३० १/२ ।।
एवं स्तुत्वाहमीशानं पाद्यमर्घ्यं च भक्तितः ।। ३३१ ।।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा सर्वं तस्मै न्यवेदयम् ।

इस प्रकार भगवान् शिवकी स्तुति करके मैंने उन्हें भक्तिभावसे पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया। फिर दोनों हाथ जोड़कर उन्हें अपना सब कुछ समर्पित कर दिया ।। ३३१ १/२ ।।
ततः शीताम्बुसंयुक्ता दिव्यगन्धसमन्विता ।। ३३२ ।।
पुष्पवृष्टिः शुभा तात पपात मम मूर्धनि ।
दुन्दुभिश्च तदा दिव्यस्ताडितो देवकिङ्करैः ।
ववौ च मारुतः पुण्यः शुचिगन्धः सुखावहः ।। ३३३ ।।

तात! तदनन्तर मेरे मस्तकपर शीतल जल और दिव्य सुगन्धसे युक्त फूलोंकी शुभ वृष्टि होने लगी। उसी समय देवकिङ्करोंने दिव्य दुन्दुभि बजाना आरम्भ किया और पवित्र गन्धसे युक्त पुण्यमयी सुखद वायु चलने लगी ।। ३३२-३३३ ।।
ततः प्रीतो महादेवः सपत्नीको वृषध्वजः ।
अब्रवीत् त्रिदशांस्तत्र हर्षयन्निव मां तदा ।। ३३४ ।।

तब पत्नीसहित प्रसन्न हुए वृषभध्वज महादेवजीने मेरा हर्ष बढ़ाते हुए-से वहाँ सम्पूर्ण देवताओंसे कहा— ।।
पश्यध्वं त्रिदशाः सर्वे उपमन्योर्महात्मनः ।
मयि भक्तिं परां नित्यमेकभावादवस्थिताम् ।। ३३५ ।।

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