भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 210

आप आश्रमियोंमें गृहस्थ, ईश्वरोंमें महेश्वर, सम्पूर्ण यक्षोंमें कुबेर तथा यज्ञोंमें विष्णु कहलाते हैं ॥ ३१९ ॥ पर्वतानां भवान् मेरुर्नक्षत्राणां च चन्द्रमाः । वसिष्ठस्त्वमृषीणां च ग्रहाणां सूर्य उच्यते ॥ ३२० ॥ पर्वतोंमें आप मेरु हैं। नक्षत्रोंमें चन्द्रमा हैं। ऋषियोंमें वसिष्ठ हैं तथा ग्रहोंमें सूर्य कहलाते हैं ॥ ३२० ॥ आरण्यानां पशूनां च सिंहस्त्वं परमेश्वरः । ग्राम्याणां गोवृषश्चासि भवाँल्लोकप्रपूजितः ॥ ३२१ ॥ आप जंगली पशुओंमें सिंह हैं। आप ही परमेश्वर हैं। ग्रामीण पशुओंमें आप ही लोकसम्मानित साँड़ हैं ॥ ३२१ ॥ आदित्यानां भवान् विष्णुर्वसूनां चैव पावकः । पक्षिणां वैनतेयस्त्वमनन्तो भुजगेषु च ॥ ३२२ ॥ आप ही आदित्योंमें विष्णु हैं। वसुओंमें अग्नि हैं। पक्षियोंमें आप विनतानन्दन गरुड और सर्पोंमें अनन्त (शेषनाग) हैं ॥ ३२२ ॥ सामवेदश्च वेदानां यजुषां शतरुद्रियम् । सनत्कुमारो योगानां सांख्यानां कपिलो ह्यसि ॥ ३२३ ॥ आप वेदोंमें सामवेद, यजुर्वेदके मन्त्रोंमें शतरुद्रिय, योगियोंमें सनत्कुमार और सांख्यवेत्ताओंमें कपिल हैं ॥ शक्रोऽसि मरुतां देव पितॄणां हव्यवाडसि । ब्रह्मलोकश्च लोकानां गतीनां मोक्ष उच्यसे ॥ ३२४ ॥ देव! आप मरुद्गणोंमें इन्द्र, पितरोंमें हव्यवाहन अग्नि, लोकोंमें ब्रह्मलोक और गतियोंमें मोक्ष कहलाते हैं ॥ क्षीरोदः सागराणां च शैलानां हिमवान् गिरिः । वर्णानां ब्राह्मणश्चासि विप्राणां दीक्षितो द्विजः ॥ ३२५ ॥ आप समुद्रोंमें क्षीरसागर, पर्वतोंमें हिमालय, वर्णोंमें ब्राह्मण और ब्राह्मणोंमें भी दीक्षित ब्राह्मण (यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले) हैं ॥ ३२५ ॥ आदिस्त्वमसि लोकानां संहर्ता काल एव च । यच्चान्यदपि लोके वै सर्व तेजोऽधिकं स्मृतम् ॥ ३२६ ॥ तत् सर्वं भगवानेव इति मे निश्चिता मतिः । आप ही सम्पूर्ण लोकोंके आदि हैं। आप ही संहार करनेवाले काल हैं। संसारमें और भी जो-जो वस्तुएँ सर्वथा तेजमें बढ़ी-चढ़ी हैं, वे सभी आप भगवान् ही हैं—यह मेरी निश्चित धारणा है ॥ ३२६ ½ ॥ नमस्ते भगवन् देव नमस्ते भक्तवत्सल ॥ ३२७ ॥