भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 209

आप सुवर्णमालाधारी तथा पर्वत-मालाओंमें विहार करनेवाले हैं। देवशत्रुओंके मुण्डोंकी माला धारण करनेवाले प्रचण्ड वेगशाली आपको नमस्कार है, नमस्कार है ।। ३१२ ।।

ब्रह्मशिरोपहर्ताय महिषघ्नाय वै नमः ।
नमः स्त्रीरूपधाराय यज्ञविध्वंसनाय च ।। ३१३ ।।
ब्रह्माजीके मस्तकका उच्छेद और महिषका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है। आप स्त्रीरूप धारण करनेवाले तथा यज्ञके विध्वंसक हैं। आपको नमस्कार है ।। ३१३ ।।

नमस्त्रिपुरहर्ताय यज्ञविध्वंसनाय च ।
नमः कामाङ्गनाशाय कालदण्डधराय च ।। ३१४ ।।
असुरोंके तीनों पुरोंका विनाश और दक्ष-यज्ञका विध्वंस करनेवाले आपको नमस्कार है। कामके शरीरका नाश तथा कालदण्डको धारण करनेवाले आपको नमस्कार है ।। ३१४ ।।

नमः स्कन्दविशाखाय ब्रह्मदण्डाय वै नमः ।
नमो भवाय शर्वाय विश्वरूपाय वै नमः ।। ३१५ ।।
स्कन्द और विशाखरूप आपको नमस्कार है। ब्रह्मदण्डस्वरूप आपको नमस्कार है। भव (उत्पादक) और शर्व (संहारक)-रूप आपको नमस्कार है। विश्वरूपधारी प्रभुको नमस्कार है ।। ३१५ ।।

ईशानाय भवघ्नाय नमोऽस्त्वन्धकघातिने ।
नमो विश्वाय मायाय चिन्त्याचिन्त्याय वै नमः ।। ३१६ ।।
आप सबके ईश्वर, संसार-बन्धनका नाश करनेवाले तथा अन्धकासुरके घातक हैं। आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण मायास्वरूप तथा चिन्त्य और अचिन्त्यरूप हैं। आपको नमस्कार है ।। ३१६ ।।

त्वं नो गतिश्च श्रेष्ठश्च त्वमेव हृदयं तथा ।
त्वं ब्रह्मा सर्वदेवानां रुद्राणां नीललोहितः ।। ३१७ ।।
आप ही हमारी गति हैं, श्रेष्ठ हैं और आप ही हमारे हृदय हैं। आप सम्पूर्ण देवताओंमें ब्रह्मा तथा रुद्रोंमें नीललोहित हैं ।। ३१७ ।।

आत्मा च सर्वभूतानां सांख्ये पुरुष उच्यते ।
ऋषभस्त्वं पवित्राणां योगिनां निष्कलः शिवः ।। ३१८ ।।
आप समस्त प्राणियोंमें आत्मा और सांख्यशास्त्रमें पुरुष कहलाते हैं। आप पवित्रोंमें ऋषभ तथा योगियोंमें निष्कल शिवरूप हैं ।। ३१८ ।।

गृहस्थस्त्वमाश्रमिणामीश्वराणां महेश्वरः ।
कुबेरः सर्वयक्षाणां क्रतूनां विष्णुरुच्यते ।। ३१९ ।।