भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2114, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2114

पादाभ्यङ्गं शिरोऽभ्यङ्गं पानं पादोदकं तथा । ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्ते यान्त्यैश्वैर्यमालयम् ॥ जो ब्राह्मणोंको पैरोंमें लगानेके लिये उबटन, सिरपर मलनेके लिये तेल, पैर धोनेके लिये जल और पीनेके लिये शर्बत देते हैं, वे घोड़ेपर सवार होकर यमलोककी यात्रा करते हैं॥

विश्रामयन्ति ये विप्रान् श्रान्तानध्वनि कर्शितान् । चक्रवाकप्रयुक्तेन यान्ति यानेन तेऽपि च ॥ जो रास्तेके थके-माँदे दुर्बल ब्राह्मणोंको ठहरनेकी जगह देकर उन्हें आराम पहुँचाते हैं, वे चक्रवाकसे जुते हुए विमानपर बैठकर यात्रा करते हैं॥

स्वागतेन च यो विप्रान् पूजयेदासनेन च । स गच्छति तदध्वानं सुखं परमनिर्वृतः ॥ जो घरपर आये हुए ब्राह्मणोंको स्वागतपूर्वक आसन देकर उनकी विधिवत् पूजा करते हैं, वे उस मार्गपर बड़े आनन्दके साथ जाते हैं॥

नमः सर्वसहाभ्यश्चेत्यभिख्याय दिने दिने । नमस्करोति नित्यं गां स सुखं याति तत्पथम् ॥ जो प्रतिदिन ‘नमः सर्वसहाभ्यश्च’ ऐसा कहकर गौको नमस्कार करता है, वह यमपुरके मार्गपर सुखपूर्वक यात्रा करता है॥

नमोऽस्तु विप्रदत्तायेत्येवंवादी दिने दिने । भूमिमाक्रमते प्रातः शयनादुत्थितश्च यः ॥ सर्वकामैः स तृप्तात्मा सर्वभूषणभूषितः । याति यानेन दिव्येन सुखं वैवस्वतालयम् ॥ प्रतिदिन प्रातःकाल बिछौनेसे उठकर जो ‘नमोऽस्तु विप्रदत्तायै’ कहते हुए पृथ्वीपर पैर रखता है, वह सब कामनाओंसे तृप्त और सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित होकर दिव्य विमानके द्वारा सुखपूर्वक यमलोकको जाता है॥

अनन्तराशिनो ये तु दम्भानृतविवर्जिताः । तेऽपि सारसयुक्तेन यान्ति यानेन वै सुखम् ॥ जो सबेरे और शामको भोजन करनेके सिवा बीचमें कुछ नहीं खाते तथा दम्भ और असत्यसे बचे रहते हैं, वे भी सारसयुक्त विमानके द्वारा सुखपूर्वक यात्रा करते हैं॥

ये चाप्येकेन भुक्तेन दम्भानृतविवर्जिताः । हंसयुक्तैर्विमानैस्तु सुखं यान्ति यमालयम् ॥ जो दिन-रातमें केवल एक बार भोजन करते हैं और दम्भ तथा असत्यसे दूर रहते हैं, वे हंसयुक्त विमानोंके द्वारा बड़े आरामके साथ यमलोकको जाते हैं॥

चतुर्थेन च भुक्तेन वर्तन्ते ये जितेन्द्रियाः ।