भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2115, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2115

यान्ति ते धर्मनगरं यानैर्बर्हिणयोजितैः ॥ जो जितेन्द्रिय होकर केवल चौथे वक्त अन्न ग्रहण करते हैं अर्थात् एक दिन उपवास करके दूसरे दिन शामको भोजन करते हैं, वे मयूरयुक्त विमानोंके द्वारा धर्मराजके नगरमें जाते हैं ।। तृतीयदिवसेनेह भुज्यते ये जितेन्द्रियाः । तेऽपि हस्तिरथैर्यान्ति तत्पथं कनकोज्ज्वलैः ॥ जो जितेन्द्रिय पुरुष यहाँ तीसरे दिन भोजन करते हैं, वे भी सोनेके समान उज्ज्वल हाथीके रथपर सवार हो यमलोक जाते हैं ।। षष्ठान्नकालिको यस्तु वर्षमेकं तु वर्तते । कामक्रोधविनिर्मुक्तः शुचिर्नित्यं जितेन्द्रियः । स याति कुञ्जरस्थैस्तु जयशब्दरवैर्युतः ॥ जो एक वर्षतक छः दिनोंके बाद भोजन करता है और काम-क्रोधसे रहित, पवित्र तथा सदा जितेन्द्रिय रहता है, वह हाथीके रथपर बैठकर जाता है, रास्तेमें उसके लिये जय-जयकारके शब्द होते रहते हैं ।। पक्षोपवासिनो यान्ति यानैः शार्दूलयोजितैः । धर्मराजपुरं रम्यं दिव्यस्त्रीगणसेवितम् ॥ एक पक्ष उपवास करनेवाले मनुष्य सिंह-जुते हुए विमानके द्वारा धर्मराजके उस रमणीय नगरको जाते हैं, जो दिव्य स्त्रीसमुदायसे सेवित है ।। ये च मासोपवासं वै कुर्वते संयतेन्द्रियाः । तेऽपि सूर्योदयप्रख्यैर्यान्ति यानैर्यमालयम् ॥ जो इन्द्रियोंको वशमें रखकर एक मासतक उपवास करते हैं, वे भी सूर्योदयकी भाँति प्रकाशित विमानोंके द्वारा यमलोकमें जाते हैं ।। गोकृते स्त्रीकृते चैव हत्वा विप्रकृतेऽपि च । ते यान्त्यमरकन्याभिः सेव्यमाना रविप्रभाः ॥ जो गौओंके लिये, स्त्रीके लिये और ब्राह्मणके लिये अपने प्राण दे देते हैं, वे सूर्यके समान कान्तिमान् और देवकन्याओंसे सेवित हो यमलोककी यात्रा करते हैं ।। ये यजन्ति द्विजश्रेष्ठाः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । हंससारससंयुक्तैर्यानैस्ते यान्ति तत्पथम् ॥ जो श्रेष्ठ द्विज अधिक दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, वे हंस और सारसोंसे युक्त विमानोंके द्वारा उस मार्गपर जाते हैं ।। परपीडामकृत्वैव भृत्यान् बिभ्रति ये नराः । तत्पथं ससुखं यान्ति विमानैः काञ्चनोज्ज्वलैः ॥