भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2121, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2121

क्षुत्पिपासाश्रमश्रान्त आर्तः खिन्नगतिर्द्विजः । पृच्छन् वै ह्यन्नदातारं गृहमभ्येत्य याचयेत् । तं पूजयेत् तु यत्नेन सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः ॥ तस्मिंस्तुष्टे नरश्रेष्ठ तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥ ‘जो दूरका रास्ता तय करनेके कारण दुर्बल तथा भूख-प्यास और परिश्रमसे थका-माँदा हो, जिसके पैर बड़ी कठिनतासे आगे बढ़ते हों तथा जो बहुत पीड़ित हो रहा हो, ऐसा ब्राह्मण अन्नदाताका पता पूछता हुआ धूलभरे पैरोंसे यदि घरपर आकर अन्नकी याचना करे तो यत्नपूर्वक उसकी पूजा करनी चाहिये; क्योंकि वह अतिथि स्वर्गका सोपान होता है। नरश्रेष्ठ! उसके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं॥

न तथा हविषा होमैर्न पुष्पैर्नानुलेपनैः । अग्नयः पार्थ तुष्यन्ति यथा ह्यतिथिपूजनात् ॥ ‘पार्थ! अतिथिकी पूजा करनेसे अग्निदेवको जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी हविष्यसे होम करने और फूल तथा चन्दन चढ़ानेसे भी नहीं होती॥

देवमाल्यापनयनं द्विजोच्छिष्टापमार्जनम् । श्रान्तसंवाहनं चैव तथा पादावसेचनम् ॥ प्रतिश्रयप्रदानं च तथा शय्यासनस्य च । एकैकं पाण्डवश्रेष्ठ गोप्रदानाद् विशिष्यते ॥ ‘पाण्डवश्रेष्ठ! देवताके ऊपर चढ़ी हुई पत्र-पुष्प आदि पूजन-सामग्रीको हटाकर उस स्थानको साफ करना, ब्राह्मणके जूठे किये हुए बर्तन और स्थानको माँज-धो देना, थके हुए ब्राह्मणका पैर दबाना, उसके चरण धोना, उसे रहनेके लिये घर, सोनेके लिये शय्या और बैठनेके लिये आसन देना—इनमेंसे एक-एक कार्यका महत्त्व गोदानसे बढ़कर है॥

पादोदकं पादघृतं दीपमन्नं प्रतिश्रयम् । ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यो नोपसर्पन्ति ते यमम् ॥ ‘जो मनुष्य ब्राह्मणोंको पैर धोनेके लिये जल, पैरमें लगानेके लिये घी, दीपक, अन्न और रहनेके लिये घर देते हैं, वे कभी यमलोकमें नहीं जाते॥

विप्रातिथ्ये कृते राजन् भक्त्या शुश्रूषितेऽपि च । देवाः शुश्रूषिताः सर्वे त्रयस्त्रिंशदरिंदम ॥ ‘शत्रुदमन! राजन्! ब्राह्मणका आतिथ्य सत्कार तथा भक्तिपूर्वक उसकी सेवा करनेसे समस्त तैंतीसों देवताओंकी सेवा हो जाती है॥

अभ्यागतो ज्ञातपूर्वो ह्यज्ञातोऽतिथिरुच्यते । तयोः पूजां द्विजः कुर्यादिति पौराणिकी श्रुतिः ॥ ‘पहलेका परिचित मनुष्य यदि घरपर आवे तो उसे अभ्यागत कहते हैं और अपरिचित पुरुष अतिथि कहलाता है। द्विजोंको इन दोनोंकी ही पूजा करनी चाहिये। यह पञ्चम वेद