भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2122, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2122

—पुराणकी श्रुति है ।।
पादाभ्यङ्गान्नपानैस्तु योऽतिथिं पूजयेन्नरः ।
पूजितस्तेन राजेन्द्र भवामीह न संशयः ।।
'राजेन्द्र! जो मनुष्य अतिथिके चरणोंमें तेल मलकर, उसे भोजन कराकर और पानी पिलाकर उसकी पूजा करता है, उसके द्वारा मेरी भी पूजा हो जाती है—इसमें संशय नहीं है ।।
शीघ्रं पापाद् विनिर्मुक्तो मया चानुगृहीकृतः ।
विमानेनेन्दुकल्पेन मम लोकं स गच्छति ।।
'वह मनुष्य तुरंत सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है और मेरी कृपासे चन्द्रमाके समान उज्ज्वल विमानपर आरूढ़ होकर मेरे परमधामको पधारता है ।।
अभ्यागतं श्रान्तमनुव्रजन्ति
देवाश्च सर्वे पितरोऽग्नयश्च ।
तस्मिन् द्विजे पूजिते पूजिताः स्यु-
र्गते निराशाः पितरो व्रजन्ति ।।
'थका हुआ अभ्यागत जब घरपर आता है, तब उसके पीछे-पीछे समस्त देवता, पितर और अग्नि भी पदार्पण करते हैं। यदि उस अभ्यागत द्विजकी पूजा हुई तो उसके साथ उन देवता आदिकी भी पूजा हो जाती है और उसके निराश लौटनेपर वे देवता, पितर आदि भी हताश होकर लौट जाते हैं ।।
अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्तते ।
पितरस्तस्य नाश्नन्ति दशवर्षाणि पञ्च च ।।
'जिसके घरसे अतिथिको निराश होकर लौटना पड़ता है, उसके पितर पंद्रह वर्षोंतक भोजन नहीं करते ।।
निर्वासयति यो विप्रं देशकालागतं गृहात् ।
पतितस्तत्क्षणादेव जायते नात्र संशयः ।।