भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 213

अद्य जातो ह्यहं देव सफलं जन्म चाद्य मे । सुरासुरगुरुर्देवो यत् तिष्ठति ममाग्रतः ॥ ३४३ ‘देव! आज ही मैंने वास्तवमें जन्म ग्रहण किया है। आज मेरा जन्म सफल हो गया; क्योंकि इस समय मेरे सामने देवताओं और असुरोंके गुरु आप साक्षात् महादेवजी खड़े हैं ॥ ३४३ ॥

यं न पश्यन्ति चैवाद्धा देवा ह्यमितविक्रमम् । तमहं दृष्टवान् देवं कोऽन्यो धन्यतरो मया ॥ ३४४ ॥ ‘जिन अमित पराक्रमी महादेवजीको देवता भी सुगमतापूर्वक देख नहीं पाते हैं उन्हींका मुझे प्रत्यक्ष दर्शन मिला है; अतः मुझसे बढ़कर धन्यवादका भागी दूसरा कौन हो सकता है? ॥ ३४४ ॥

एवं ध्यायन्ति विद्वांसः परं तत्त्वं सनातनम् । तद् विशेषमिति ख्यातं यदजं ज्ञानमक्षरम् ॥ ३४५ ॥ ‘अजन्मा, अविनाशी, ज्ञानमय तथा सर्वश्रेष्ठ रूपसे विख्यात जो सनातन परम तत्त्व है, उसका ज्ञानी पुरुष इसी रूपमें ध्यान करते हैं (जैसा कि आज मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ) ॥ ३४५ ॥

स एष भगवान् देवः सर्वसत्त्वादिरव्ययः । सर्वतत्त्वविधानज्ञः प्रधानपुरुषः परः ॥ ३४६ ॥ 'जो सम्पूर्ण प्राणियोंका आदिकारण, अविनाशी, समस्त तत्त्वोंके विधानका ज्ञाता तथा प्रधान परम पुरुष है, वह ये भगवान् महादेवजी ही हैं ॥ ३४६ ॥

योऽसृजद् दक्षिणादङ्गाद् ब्रह्माणं लोकसम्भवम् । वामपार्श्वात् तथा विष्णुं लोकरक्षार्थमीश्वरः ॥ ३४७ ॥ ‘इन्हीं जगदीश्वरने अपने दाहिने अङ्गसे लोकस्रष्टा ब्रह्माको और बायें अङ्गसे जगत्की रक्षाके लिये विष्णुको उत्पन्न किया है ॥ ३४७ ॥

युगान्ते चैव सम्प्राप्ते रुद्रमीशोऽसृजत् प्रभुः । स रुद्रः संहरन् कृत्स्नं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ ३४८ ॥ ‘प्रलयकाल प्राप्त होनेपर इन्हीं भगवान् शिवने रुद्रकी रचना की थी। वे ही रुद्र सम्पूर्ण चराचर जगत्का संहार करते हैं ॥ ३४८ ॥

कालो भूत्वा महातेजाः संवर्तक इवानलः । युगान्ते सर्वभूतानि ग्रसन्निव व्यवस्थितः ॥ ३४९ ॥ ‘वे ही महातेजस्वी काल होकर कल्पके अन्तमें समस्त प्राणियोंको अपना ग्रास बनाते हुए-से प्रलयकालीन अग्निके सदृश स्थित होते हैं ॥ ३४९ ॥

एष देवो महादेवो जगत् सृष्ट्वा चराचरम् । कल्पान्ते चैव सर्वेषां स्मृतिमाक्षिप्य तिष्ठति ॥ ३५० ॥