महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 214, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें'ये ही देवदेव महादेव चराचर जगत्की सृष्टि करके कल्पान्तमें सबकी स्मृति-शक्तिको मिटाकर स्वयं ही स्थित रहते हैं ॥ ३५० ॥
सर्वगः सर्वभूतात्मा सर्वभूतभवोद्भवः ।
आस्ते सर्वगतो नित्यमदृश्यः सर्वदैवतैः ॥ ३५१ ॥
'ये सर्वत्र गमन करनेवाले, सम्पूर्ण प्राणियोंके आत्मा तथा समस्त भूतोंके जन्म और वृद्धिके हेतु हैं। ये सर्वव्यापी परमेश्वर सदा सम्पूर्ण देवताओंसे अदृश्य रहते हैं ॥ ३५१ ॥
यदि देयो वरो मह्यं यदि तुष्टोऽसि मे प्रभो ।
भक्तिर्भवतु मे नित्यं त्वयि देव सुरेश्वर ॥ ३५२ ॥
'प्रभो! यदि आप मुझपर संतुष्ट हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो हे देव! हे सुरेश्वर! मेरी सदा आपमें भक्ति बनी रहे ॥ ३५२ ॥
अतीतानागतं चैव वर्तमानं च यद् विभो ।
जानीयामिति मे बुद्धिः प्रसादात् सुरसत्तम ॥ ३५३ ॥
'सुरश्रेष्ठ! विभो! आपकी कृपासे मैं भूत, वर्तमान और भविष्यको जान सकूँ; ऐसा मेरा निश्चय है ॥ ३५३ ॥
क्षीरोदनं च भुञ्जीयामक्षयं सह बान्धवैः ।
आश्रमे च सदास्माकं सांनिध्यं परमस्तु ते ॥ ३५४ ॥
'मैं अपने बन्धु-बान्धवोंसहित सदा अक्षय दूध-भातका भोजन प्राप्त करूँ और हमारे इस आश्रममें सदा आपका निकट निवास रहे' ॥ ३५४ ॥
एवमुक्तः स मां प्राह भगवाँल्लोकपूजितः ।
महेश्वरो महातेजाश्चराचरगुरुः शिवः ॥ ३५५ ॥
मेरे ऐसा कहनेपर लोकपूजित चराचरगुरु महातेजस्वी महेश्वर भगवान् शिव मुझसे यों बोले— ॥ ३५५ ॥
श्रीभगवानुवाच
अजरश्चामरश्चैव भव त्वं दुःखवर्जितः ।
यशस्वी तेजसा युक्तो दिव्यज्ञानसमन्वितः ॥ ३५६ ॥
भगवान् शिवने कहा— ब्रह्मन्! तुम दुःखसे रहित अजर-अमर हो जाओ। यशस्वी, तेजस्वी तथा दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न बने रहो ॥ ३५६ ॥
ऋषीणामभिगम्यश्च मत्प्रसादाद् भविष्यसि ।
शीलवान् गुणसम्पन्नः सर्वज्ञः प्रियदर्शनः ॥ ३५७ ॥
मेरी कृपासे तुम ऋषियोंके भी दर्शनीय एवं आदरणीय होओगे तथा सदा शीलवान्, गुणवान्, सर्वज्ञ एवं प्रियदर्शन बने रहोगे ॥ ३५७ ॥
अक्षयं यौवनं तेऽस्तु तेजश्चैवानलोपमम् ।