महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षीरोदः सागरश्चैव यत्र यत्रेच्छसि प्रियम् ।। ३५८ ।।
तत्र ते भविता कामं सांनिध्यं पयसो निधेः ।
तुम्हें अक्षय यौवन और अग्निके समान तेज प्राप्त हो। तुम्हारे लिये क्षीरसागर सुलभ हो जायगा। तुम जहाँ-जहाँ प्रिय वस्तुकी इच्छा करोगे वहाँ-वहाँ तुम्हारी सारी कामना सफल होगी; और तुम्हें क्षीरसागरका सान्निध्य प्राप्त होगा ।। ३५८ १/२ ।।
क्षीरोदनं च भुङ्क्ष्व त्वममृतेन समन्वितम् ।। ३५९ ।।
बन्धुभिः सहितः कल्पं ततो मामुपयास्यसि ।
अक्षया बान्धवाश्चैव कुलं गोत्रं च ते सदा ।। ३६० ।।
तुम अपने भाई-बन्धुओंके साथ एक कल्पतक अमृतसहित दूध-भातका भोजन पाते रहो। तत्पश्चात् तुम मुझे प्राप्त हो जाओगे। तुम्हारे बन्धु-बान्धव, कुल तथा गोत्रकी परम्परा सदा अक्षय बनी रहेगी ।।
भविष्यति द्विजश्रेष्ठ मयि भक्तिश्च शाश्वती ।
सांनिध्यं चाश्रमे नित्यं करिष्यामि द्विजोत्तम ।। ३६१ ।।
द्विजश्रेष्ठ! मुझमें तुम्हारी सदा अचल भक्ति होगी तथा द्विजप्रवर! तुम्हारे इस आश्रमके निकट मैं सदा अदृश्य रूपसे निवास करूँगा ।। ३६१ ।।
तिष्ठ वत्स यथाकामं नोत्कण्ठां च करिष्यसि ।
स्मृतस्त्वया पुनर्विप्र करिष्यामि च दर्शनम् ।। ३६२ ।।
बेटा! तुम इच्छानुसार यहाँ रहो। कभी किसी बातके लिये चिन्ता न करना। विप्रवर! तुम्हारे स्मरण करनेपर मैं पुनः तुम्हें दर्शन दूँगा ।। ३६२ ।।
एवमुक्त्वा स भगवान् सूर्यकोटिसमप्रभः ।
ईशानः स वरान् दत्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ।। ३६३ ।।
ऐसा कहकर वे करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी भगवान् शंकर उपर्युक्त वर प्रदान करके वहीं अन्तर्धान हो गये ।। ३६३ ।।
एवं दृष्टो मया कृष्ण देवदेवः समाधिना ।
तदवाप्तं च मे सर्वं यदुक्तं तेन धीमता ।। ३६४ ।।
श्रीकृष्ण! इस प्रकार मैंने समाधिके द्वारा देवाधिदेव भगवान् शंकरका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त किया। उन बुद्धिमान् महादेवजीने जो कुछ कहा था, वह सब मुझे प्राप्त हो गया है ।। ३६४ ।।
प्रत्यक्षं चैव ते कृष्ण पश्य सिद्धान् व्यवस्थितान् ।
ऋषीन् विद्याधरान् यक्षान् गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।। ३६५ ।।
श्रीकृष्ण! यह सब आप प्रत्यक्ष देख लें। यहाँ सिद्ध महर्षि, विद्याधर, यक्ष, गन्धर्व और अप्सराएँ विद्यमान हैं ।। ३६५ ।।
पश्य वृक्षलतागुल्मान् सर्वपुष्पफलप्रदान् ।