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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 216

सर्वर्तुकुसुमैर्युक्तान् सुखपत्रान् सुगन्धिनः ॥ ३६६ ॥
देखिये, यहाँके वृक्ष, लता और गुल्म सब प्रकारके फूल और फल देनेवाले हैं। ये सभी ऋतुओंके फूलोंसे युक्त, सुखदायक पल्लवोंसे सम्पन्न और सुगन्धसे परिपूर्ण हैं ॥ ३६६ ॥

सर्वमेतन्महाबाहो दिव्यभावसमन्वितम् ।
प्रसादाद् देवदेवस्य ईश्वरस्य महात्मनः ॥ ३६७ ॥
महाबाहो! देवताओंके भी देवता तथा सबके ईश्वर महात्मा शिवके प्रसादसे ही यहाँ सब कुछ दिव्य भावसे सम्पन्न दिखायी देता है ॥ ३६७ ॥

वासुदेव उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य प्रत्यक्षमिव दर्शनम् ।
विस्मयं परमं गत्वा अब्रुवं तं महामुनिम् ॥ ३६८ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— राजन्! उनकी यह बात सुनकर मानो मुझे भगवान् शिवका प्रत्यक्ष दर्शन हो गया हो, ऐसा प्रतीत हुआ। फिर बड़े विस्मयमें पड़कर मैंने उन महामुनिसे पूछा— ॥ ३६८ ॥

धन्यस्त्वमसि विप्रेन्द्र कस्त्वदन्योऽसि पुण्यकृत् ।
यस्य देवाधिदेवस्ते सांनिध्यं कुरुतेऽऽश्रमे ॥ ३६९ ॥
‘विप्रवर! आप धन्य हैं। आपसे बढ़कर पुण्यात्मा पुरुष दूसरा कौन है? क्योंकि आपके इस आश्रममें साक्षात् देवाधिदेव महादेव निवास करते हैं ॥ ३६९ ॥

अपि तावन्ममाप्येवं दद्यात् स भगवान् शिवः ।
दर्शनं मुनिशार्दूल प्रसादं चापि शंकरः ॥ ३७० ॥
‘मुनिश्रेष्ठ! क्या कल्याणकारी भगवान् शिव मुझे भी इसी प्रकार दर्शन देंगे? मुझपर भी कृपा करेंगे?’ ॥

उपमन्युरुवाच

द्रक्ष्यसे पुण्डरीकाक्ष महादेवं न संशयः ।
अचिरेणैव कालेन यथा दृष्टो मयानघ ॥ ३७१ ॥
उपमन्यु बोले— निष्पाप कमलनयन! जैसे मैंने भगवान्‌का दर्शन किया है, उसी प्रकार आप भी थोड़े ही समयमें महादेवजीका दर्शन प्राप्त करेंगे; इसमें संशय नहीं है ॥ ३७१ ॥

चक्षुषा चैव दिव्येन पश्याम्यमितविक्रमम् ।
षष्ठे मासि महादेवं द्रक्ष्यसे पुरुषोत्तम ॥ ३७२ ॥
पुरुषोत्तम! मैं दिव्य दृष्टिसे देख रहा हूँ। आप आजसे छठे महीनेमें अमित पराक्रमी महादेवजीका दर्शन करेंगे ॥ ३७२ ॥

षोडशाष्टौ वरांश्चापि प्राप्स्यसि त्वं महेश्वरात् ।
सपत्नीकाद् यदुश्रेष्ठ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३७३ ॥

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