महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो मनुष्य ब्राह्मणको शिल्प, वेद, मन्त्र, ओषधि आदि विद्याओंका दान करता है, उसके पुण्यफलको सुनो ।। छन्दोभिः सम्प्रयुक्तेन विमानेन विराजता । सप्तर्षिलोकान् व्रजति पूज्यते ब्रह्मवादिभिः ।। वह वेदमन्त्रोंके बलसे चलनेवाले सुन्दर विमानपर आरूढ़ हो सप्तर्षियोंके लोकमें जाता और वहाँ ब्रह्मवादी महर्षियोंसे पूजित होता है ।। चतुर्युगानि वै त्रिंशत् क्रीडित्वा तत्र देववत् । इह मानुष्यके लोके विप्रो भवति वेदवित् ।। उस लोकमें तीस चतुर्युगीतक देवताओंकी भाँति क्रीड़ा करके वह मनुष्यलोकमें वेदवेत्ता ब्राह्मण होता है ।। विश्रामयति यो विप्रं श्रान्तमध्वनि कर्शितम् । विनश्यति तदा पापं तस्य वर्षकृतं नृप ।। राजन्! जो रास्तेके थके-माँदे दुर्बल ब्राह्मणको विश्राम देता है, उसका एक वर्षका किया हुआ पाप तत्काल नष्ट हो जाता है ।। अथ प्रक्षालयेत् पादौ तस्य तोयेन भक्तिमान् । दशवर्षकृतं पापं व्यपोहति न संशयः ।। तदनन्तर जब वह भक्तिपूर्वक उस अतिथिके दोनों चरणोंको जलसे पखारता है, उस समय उसके दस वर्षके किये हुए पाप निःसंदेह नष्ट हो जाते हैं ।। घृतेन वाथ तैलेन पादौ तस्य तु पूजयेत् । तद् द्वादशसमारूढं पापमाशु व्यपोहति ।। तथा यदि वह उसके दोनों पैरोंमें घी या तेल मलकर उसकी पूजा करता है तो उसके बारह वर्षोंके पाप तुरंत नष्ट हो जाते हैं ।। स्वागतेन तु यो विप्रं पूजयेदासनेन च । प्रत्युत्थानेन वा राजन् स देवानां प्रियो भवेत् ।। राजन्! जो घरपर आये हुए ब्राह्मणका स्वागत करके उसे आसन और अभ्युत्थान देकर पूजन करता है, वह देवताओंका प्रिय होता है ।। स्वागतेनाग्नयो राजन्नासनेन शतक्रतुः । प्रत्युत्थानेन पितरः प्रीतिं यान्त्यतिथिप्रियाः ।। महाराज! अतिथिके स्वागतसे अग्नि, उसे आसन देनेसे इन्द्र और अगवानी करनेसे अतिथियोंपर प्रेम रखनेवाले पितर प्रसन्न होते हैं ।। अग्निशक्रपितॄणां च तेषां प्रीत्या नराधिप । संवत्सरकृतं पापं तस्य सद्यो विनश्यति ।।