महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनरेश्वर! इस प्रकार अग्नि, इन्द्र और पितरोंके प्रसन्न होनेपर मनुष्यका एक वर्षका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है ।। यः प्रयच्छति विप्राय आसनं माल्यभूषितम् । स याति मणिचित्रेण रथेनेन्द्रनिकेतनम् ।। जो मनुष्य ब्राह्मणको मालाओंसे विभूषित आसन प्रदान करता है, वह मणियोंसे चित्रित रथके द्वारा इन्द्रलोकमें जाता है ।। पुरंदरासने तत्र दिव्यनारीविभूषितः । षष्टिं वर्षसहस्राणि क्रीडत्यप्सरसां गणैः ।। वहाँ इन्द्रासनपर दिव्य स्त्रियोंके साथ शोभा पाता है और साठ हजार वर्षोंतक अप्सरागणोंके साथ क्रीड़ा करता है ।। वाहनं यः प्रयच्छेत ब्राह्मणाय युधिष्ठिर । स याति रत्नचित्रेण वाहनेन सुरालयम् ।। युधिष्ठिर! जो मनुष्य ब्राह्मणको सवारी दान करता है, वह रत्नोंसे चित्रित विमानपर बैठकर स्वर्गलोकको जाता है ।। स तत्र कामं क्रीडित्वा सेव्यमानोऽप्सरोगणैः । इह राजा भवेद् राजन् नात्र कार्या विचारणा ।। राजन्! वहाँ वह अप्सरागणोंके द्वारा सेवित होकर इच्छानुसार क्रीड़ा करता है। फिर इस लोकमें राजा होता है—इसमें कोई विचारकी बात नहीं है ।। पादपं पल्लवाकीर्णं पुष्पितं फलितं तथा । गन्धमाल्यैरथाभ्यर्च्य वस्त्राभरणभूषितम् । यः प्रयच्छति विप्राय श्रोत्रियाय सदक्षिणम् । भोजयित्वा यथाकामं तस्य पुण्यफलं शृणु ।। जो पुरुष पत्ते, फूल और फलोंसे भरे हुए वृक्षोंको वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित करके चन्दन और फूलोंसे उसकी पूजा करता है तथा वेदवेत्ता ब्राह्मणको भोजन कराकर दक्षिणाके साथ उस वृक्षका दान कर देता है, उसके पुण्यका फल सुनो ।। जाम्बूनदविचित्रेण विमानेन विराजता । पुरंदरपुरं याति जयशब्दरवैर्युतः ।। वह सुवर्णजटित सुन्दर विमानपर बैठकर जय-जयकारके शब्द सुनता हुआ इन्द्रलोकमें जाता है ।। तत्र शक्रपुरे रम्ये तस्य कल्पकपादपः । ददाति चेप्सितं सर्वं मनसा यद् यदिच्छति ।। वहाँ रमणीय इन्द्रनगरीमें उसके मनमें जो-जो इच्छाएँ होती हैं, उन सब अभीष्ट वस्तुओंको कल्पवृक्ष देता है ।।