भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2140, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2140

जो उत्तम पुरुष जूता और छाता दान करता है, वह महान् तेजसे सम्पन्न हो सोनेके बने हुए सुन्दर रथपर बैठकर अप्सरागणोंसे सेवित हुआ इन्द्रलोकमें जाता है ।। काष्ठपादुकदा यान्ति विमानैर्वृक्षनिर्मितैः । धर्मराजपुरं रम्यं सेव्यमानाः सुरोत्तमैः ॥ जो काठकी खड़ाऊँ दान करते हैं, वे काष्ठनिर्मित विमानोंपर आरूढ़ होकर श्रेष्ठ देवताओंसे सेवित हो धर्मराजके रमणीय नगरमें प्रवेश करते हैं ।। दन्तकाष्ठप्रदानेन प्रियवाक्यो भवेन्नरः । सुगन्धवदनः श्रीमान् मेधासौभाग्यसंयुतः ॥ दातौनका दान करनेसे मनुष्य मधुरभाषी होता है। उसके मुँहसे सुगन्ध निकलती रहती है तथा वह लक्ष्मीवान् एवं बुद्धि और सौभाग्यसे सम्पन्न होता है ।। अनन्तराशी यश्चापि वर्तते व्रतवत् सदा । सत्यवाक्क्रोधरहितः शुचिः स्नानरतः सदा । स विमानेन दिव्येन याति शक्रपुरं नरः ॥ जो मनुष्य अतिथि और कुटुम्बीजनोंको भोजन करा लेनेके पश्चात् स्वयं भोजन करता है, सदा व्रतका पालन करता है, सत्य बोलता है, क्रोधसे दूर रहता है तथा स्नान आदिके द्वारा सर्वदा पवित्र रहता है, वह दिव्य विमानके द्वारा इन्द्रलोककी यात्रा करता है ।। एकभक्तेन यश्चापि वर्षमेकं तु वर्तते । ब्रह्मचारी जितक्रोधः सत्यशौचसमन्वितः । स विमानेन दिव्येन याति शक्रपुरं नरः ॥ जो एक वर्षतक प्रतिदिन एक वक्त भोजन करता है, ब्रह्मचर्यका पालन करता है, क्रोधको काबूमें रखता है तथा सत्य और शौचका पालन करता है, वह दिव्य विमानमें बैठकर इन्द्रलोकमें पदार्पण करता है ।। चतुर्थकाले यो भुङ्क्ते ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । वर्तते चैकवर्षं तु तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ जो एक वर्षतक चौथे वक्त अर्थात् प्रति दूसरे दिन भोजन करता है, ब्रह्मचर्यका पालन करता है और इन्द्रियोंको काबूमें रखता है, उसके पुण्यका फल सुनो ।। चित्रबर्हिणयुक्तेन विचित्रध्वजशोभिना । याति यानेन दिव्येन स महेन्द्रपुरं नरः ॥ वह मनुष्य विचित्र पंखवाले मोरोंसे जुते हुए अद्भुत ध्वजसे शोभायमान दिव्य विमानपर आरूढ़ हो महेन्द्रलोकमें गमन करता है ।। निवेशयति मन्मूर्त्यामात्मानं मद्गतः शुचिः । रुद्रदक्षिणमूर्त्यां वा चतुर्दश्यां विशेषतः ॥ सिद्धैर्ब्रह्मर्षिभिश्चैव देवलोकैश्च पूजितः ।