भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2141, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2141

गन्धर्वैर्भूतसङ्घैश्च गीयमानो महातपाः ।। प्रविशेत् स महातेजा मां वा शङ्करमेव वा । न स्यात् पुनर्भवो राजन् नात्र कार्या विचारणा ।। राजन्! जो मनुष्य पवित्र और मेरे परायण होकर मेरे श्रीविग्रहमें मन लगाता (मेरा ध्यान करता) है तथा विशेषतः चतुर्दशीके दिन रुद्र अथवा दक्षिणामूर्तिमें चित्त एकाग्र करता है, वह महान् तपस्वी पुरुष सिद्धों, ब्रह्मर्षियों और देवताओंसे पूजित होकर गन्धर्वों और भूतोंका गान सुनता हुआ मुझमें या शंकरमें प्रवेश कर जाता है तथा उसका इस संसारमें फिर जन्म नहीं होता—इसमें कोई विचारकी बात नहीं है ।।

गोकृते स्त्रीकृते चैव गुरुविप्रकृतेऽपि वा । हन्यन्ते ये तु राजेन्द्र शक्रलोकं व्रजन्ति ते ।। राजेन्द्र! जो मनुष्य गौ, स्त्री, गुरु और ब्राह्मणकी रक्षाके लिये प्राण दे डालते हैं, वे इन्द्रलोकमें जाते हैं ।।

तत्र जाम्बूनदमये विमाने कामगामिनि । मन्वन्तरं प्रमोदन्ते दिव्यनारीनिषेविताः ।। वहाँ इच्छानुसार विचरनेवाले सुवर्णके बने हुए विमानपर रहकर दिव्य नारियोंसे सेवित हुए एक मन्वन्तरतक आनन्दका अनुभव करते हैं ।।

आश्रुतस्य प्रदानेन दत्तस्य हरणेन च । जन्मप्रभृति यद् दत्तं तत् सर्वं तु विनश्यति ।। देनेकी प्रतिज्ञा की हुई वस्तुको न देनेसे अथवा दी हुई वस्तुको छीन लेनेसे जन्मभरका किया हुआ सारा दान-पुण्य नष्ट हो जाता है ।।

यद् यदिष्टतमं द्रव्यं न्यायेनोपार्जितं च यत् । तत् तद् गुणवते देयं तदेवाक्षय्यमिच्छता ।। अक्षय सुख चाहनेवाले मनुष्यको चाहिये कि जो-जो न्यायसे उपार्जित किया हुआ अत्यन्त अभीष्ट द्रव्य है, वह-वह गुणवान् ब्राह्मणको दानमें दे ।।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)