भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2143, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2143

प्राणाग्निहोत्रहोत्रं च प्राशितं विधिवद् विदुः ।
बलिकर्म च राजेन्द्र पाकयज्ञाः प्रकीर्तिताः ॥
राजेन्द्र! प्राणाग्निहोत्रकी विधिसे जो प्राणोंको पाँच ग्रास अर्पण किये जाते हैं, उनकी 'प्राशित' संज्ञा है तथा गौ आदि प्राणियोंकी तृप्तिके लिये जो अन्नकी बलि दी जाती है, उसीका नाम बलिदान है। इन पाँच कर्मोंको पाकयज्ञ कहते हैं ॥

केचित् पञ्च महायज्ञान् पाकयज्ञान् प्रचक्षते ।
अपरे ब्रह्मयज्ञादीन् महायज्ञविदो विदुः ॥
कितने ही विद्वान् इन पाकयज्ञोंको ही पञ्चमहायज्ञ कहते हैं; किन्तु दूसरे लोग, जो महायज्ञके स्वरूपको जाननेवाले हैं, ब्रह्मयज्ञ आदिको ही पञ्चमहायज्ञ मानते हैं ॥

सर्व एते महायज्ञाः सर्वथा परिकीर्तिताः ।
बुभुक्षितान् ब्राह्मणांस्तु यथाशक्ति न हापयेत् ॥
ये सभी सब प्रकारसे महायज्ञ बतलाये गये हैं। घरपर आये हुए भूखे ब्राह्मणोंको यथाशक्ति निराश नहीं लौटाना चाहिये ॥

तस्मात् स्नात्वा द्विजो विद्वान् कुर्यादेतान् दिने दिने ।
अतोऽन्यथा तु भुञ्जन् वै प्रायश्चित्ती भवेद् द्विजः ॥
इसलिये विद्वान् द्विजको चाहिये कि वह प्रतिदिन स्नान करके इन यज्ञोंका अनुष्ठान करे। इन्हें किये बिना भोजन करनेवाला द्विज प्रायश्चित्तका भागी होता है ॥

युधिष्ठिर उवाच
देवदेवेश दैत्यघ्न त्वद्भक्तस्य जनार्दन ।
वक्तुमर्हसि देवेश स्नानस्य च विधिं मम ॥
युधिष्ठिरने कहा—देवदेव! आप दैत्योंके विनाशक और देवताओंके स्वामी हैं। जनार्दन! अपने इस भक्तको स्नान करनेकी विधि बताइये ॥

श्रीभगवानुवाच
शृणु पाण्डव तत् सर्वं पवित्रं पापनाशनम् ।
स्नात्वा येन विधानेन मुच्यन्ते किल्बिषाद् द्विजाः ॥
श्रीभगवान् बोले—पाण्डुनन्दन! जिस विधिके अनुसार स्नान करनेसे द्विजगण समस्त पापोंसे छूट जाते हैं, उस परम पवित्र पापनाशक विधिका पूर्णरूपसे श्रवण करो ॥

मृदं च गोमयं चैव तिलं दर्भांस्तथैव च ।