भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2144, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2144

पुष्पाण्यपि यथान्यायमादाय तु जलं व्रजेत् ॥ मिट्टी, गोबर, तिल, कुशा और फूल आदि शास्त्रोक्त सामग्री लेकर जलके समीप जाय ॥ नद्यां स्नात्वा न च स्नायादन्यत्र द्विजसत्तमः । सति प्रभूते पयसि नाल्पे स्नायात् कदाचन ॥ श्रेष्ठ द्विजको उचित है कि वह नदीमें स्नान करनेके पश्चात् और किसी जलमें न नहाये। अधिक जलवाला जलाशय उपलब्ध हो तो थोड़े-से जलमें कभी स्नान न करे ॥ गत्वोदकसमीपं तु शुचौ देशे मनोरमे । ततो मृद्गोमयादीनि तत्र विप्रो विनिक्षिपेत् ॥ ब्राह्मणको चाहिये कि जलके निकट जाकर शुद्ध और मनोरम जगहपर मिट्टी और गोबर आदि सामग्री रख दे ॥ बहिः प्रक्षाल्य पादौ च द्विराचम्य प्रयत्नतः । प्रदक्षिणं समावृत्य नमस्कुर्यात् तु तज्जलम् ॥ तथा पानीसे बाहर ही प्रयत्नपूर्वक अपने दोनों पैर धोकर दो बार आचमन करे। फिर जलाशयकी प्रदक्षिणा करके उसके जलको नमस्कार करे ॥ सर्वदेवमया ह्यापो मन्मयाः पाण्डुनन्दन । तस्मात् तास्तु न हन्तव्यास्त्वद्भिः प्रक्षालयेत्स्थलम् ॥ पाण्डुनन्दन! जल सम्पूर्ण देवताओंका तथा मेरा भी स्वरूप है; अतः उसपर प्रहार नहीं करना चाहिये। जलाशयके जलसे उसके किनारेकी भूमिको धोकर साफ करे ॥ केवलं प्रथमं मज्जेन्नाङ्गानि विमृशेद् बुधः । तत् तु तीर्थं समासाद्य कुर्यादाचमनं पुनः ॥ फिर बुद्धिमान् पुरुष पानीमें प्रवेश करके एक बार सिर्फ डुबकी लगावे, अंगोंकी मैल न छुड़ाने लगे। इसके बाद पुनः आचमन करे ॥ गोकर्णाकृतिवत् कृत्वा करं त्रिःप्रपिबेज्जलम् । द्विस्तत्परिमृजेद् वक्त्रं पादावभ्युक्ष्य चात्मनः । शीर्षण्यं तु ततः प्राणान् सकृदेव तु संस्पृशेत् ॥ हाथका आकार गायके कानकी तरह बनाकर उससे तीन बार जल पीये। फिर अपने पैरोंपर जल छिड़ककर दो बार मुखमें जलका स्पर्श करे। तदनन्तर गलेके ऊपरी भागमें स्थित आँख, कान और नाक आदि समस्त इन्द्रियोंका एक-एक बार जलसे स्पर्श करे ॥ बाहू द्वौ च ततः स्पृष्ट्वा हृदयं नाभिमेव च ।

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 2144, कुल 2566 में से · BharatKosha