महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यङ्गमूदकं स्पृष्ट्वा मूर्धानं तु पुनः स्पृशेत् ।। फिर दोनों भुजाओंका स्पर्श करनेके पश्चात् हृदय और नाभिका भी स्पर्श करे। इस प्रकार प्रत्येक अंगमें जलका स्पर्श कराकर फिर मस्तकपर जल छिड़के ।। आपः पुनन्वित्युक्त्वा च पुनराचमनं चरेत् । सोङ्कारव्याहृतीर्वापि सदसस्पतिमित्यृचम् ।। इसके बाद ‘आपः पुनन्तु०³’ मन्त्र पढ़कर फिर आचमन करे अथवा आचमनके समय ओंकार और व्याहृतियोंसहित ‘सदसस्पतिम्०³’ इस ऋचाका पाठ करे ।। आचम्य मृत्तिकाः पश्चात् त्रिधा कृत्वा समालभेत् । ऋचेदं विष्णुरित्यङ्गमुत्तमाधममध्यमम् । आलभ्य वारुणैः सूक्तैर्नमस्कृत्य जलं ततः ।। आचमनके बाद मिट्टी लेकर उसके तीन भाग करे और ‘इदं विष्णुः०³’ इस मन्त्रको पढ़कर उसे क्रमशः ऊपरके, मध्यभागके तथा नीचेके अंगोंमें लगावे। तत्पश्चात् वारुण-सूक्तोंसे जलको नमस्कार करके स्नान करे ।। स्रवन्ती चेत् प्रतिस्रोते प्रत्यर्कं चान्यवारिषु । मज्जेदोमित्युदाहृत्य न च विक्षोभयेज्जलम् ।। यदि नदी हो तो जिस ओरसे उसकी धारा आती हो, उसी ओर मुँह करके तथा दूसरे जलाशयोंमें सूर्यकी ओर मुँह करके स्नान करना चाहिये। ॐकारका उच्चारण करते हुए धीरेसे गोता लगावे, जलमें हलचल पैदा न करे ।। गोमयं च त्रिधा कृत्वा जले पूर्वं समालभेत् । सव्याहृतीकां सप्रणवां गायत्रीं च जपेत् पुनः ।। इसके बाद गोबरको हाथमें ले जलसे गीला करके उसके तीन भाग करे और उसे भी पूर्ववत् अपने शरीरके ऊर्ध्वभाग, मध्यभाग तथा अधोभागमें लगावे। उस समय प्रणव और व्याहृतियोंसहित गायत्रीमन्त्रकी पुनरावृत्ति करता रहे ।। पुनराचमनं कृत्वा मद्गतेनान्तरात्मना । आपो हिष्ठेति तिसृभीर्ऋग्भिः पूतेन वारिणा । तथा तरत्समन्दीभिः सिञ्चेच्चतसृभिः क्रमात् ।। गोसूक्तेनाश्वसूक्तेन शुद्धवर्गेण चात्मनः । वैष्णवैर्वारुणैः सूक्तैः सावित्रैरिन्द्रदैवतैः ।। वामदैव्येन चात्मानमन्यैर्मन्मयसामभिः । स्थित्वान्तः सलिले सूक्तं जपेद् वा चाघमर्षणम् ।।