भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2146, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2146

फिर मुझमें चित्त लगाकर आचमन करनेके पश्चात् 'आपो हिष्ठा मयो'१ इत्यादि तीन ऋचाओंसे, 'तरत्समन्दीभिः' इत्यादि चार ऋचाओंसे और गोसूक्त, अश्वसूक्त, वैष्णवसूक्त, वारुणसूक्त, सावित्रसूक्त, ऐन्द्रसूक्त, वामदैव्यसूक्त तथा मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य साममन्त्रोंके द्वारा शुद्ध जलसे अपने ऊपर मार्जन करे। फिर जलके भीतर स्थित होकर अघमर्षणसूक्तका२ जप करे ।।

सव्याहृतीकां सप्रणवां गायत्रीं वा ततो जपेत् ।
आश्वासमोक्षात् प्रणवं जपेद् वा मामनुस्मरन् ।।
अथवा प्रणव एवं व्याहृतियोंसहित गायत्रीमन्त्र जपे या जबतक साँस रुकी रहे तबतक मेरा स्मरण करते हुए केवल प्रणवका ही जप करता रहे ।।

उत्प्लुत्य तीर्थमासाद्य धौते शुक्ले च वाससी ।
शुद्धे चाच्छादयेत् कक्षे न कुर्यात् परिपाशके ।।
इस प्रकार स्नान करके जलाशयके किनारे आकर धोये हुए शुद्ध वस्त्र—धोती और चादर धारण करे। चादरको काँखमें रस्सीकी भाँति लपेटकर बाँधे नहीं ।।

पाशेन बद्ध्वा कक्षे यत् कुरुते कर्म वैदिकम् ।
राक्षसा दानवा दैत्यास्तद् विलुम्पन्ति हर्षिताः ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कक्ष्यापाशं न धारयेत् ।।
जो वस्त्रको काँखमें रस्सीकी भाँति लपेट करके वैदिक कर्मोंका अनुष्ठान करता है, उसके कर्मको राक्षस, दानव और दैत्य बड़े हर्षमें भरकर नष्ट कर डालते हैं; इसलिये सब प्रकारके प्रयत्नसे काँखको वस्त्रसे बाँधना नहीं चाहिये ।।

ततः प्रक्षाल्य पादौ च हस्तौ चैव मृदा शनैः ।
आचम्य पुनराचामेत् पुनः सावित्रिया द्विजः ।।
ब्राह्मणको चाहिये कि वस्त्र-धारणके पश्चात् धीरे-धीरे हाथ और पैरोंको मिट्टीसे मलकर धो डाले, फिर गायत्री-मन्त्र पढ़कर आचमन करे ।।

प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि ध्यायन् वेदान् समाहितः ।
जले जलगतः शुद्धः स्थल एव स्थलस्थितः ।
उभयत्र स्थितस्तस्मादाचामेदात्मशुद्धये ।।
तथा पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके एकाग्रचित्तसे वेदोंका स्वाध्याय करे। जलमें खड़ा हुआ द्विज जलमें ही आचमन करके शुद्ध हो जाता है और स्थलमें