महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2147, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्थित पुरुष स्थलमें ही आचमनके द्वारा शुद्ध होता है, अतः जल और स्थलमेंसे कहीं भी स्थित होनेवाले द्विजको आत्मशुद्धिके लिये आचमन करना चाहिये ।।
दर्भेषु दर्भपाणिः सन् प्राङ्मुखः सुसमाहितः ।
प्राणायामांस्ततः कुर्यान्मद्गतेनान्तरात्मना ।।
इसके बाद संध्योपासन करनेके लिये हाथोंमें कुश लेकर पूर्वाभिमुख हो कुशासनपर बैठे और मुझमें मन लगाकर एकाग्रभावसे प्राणायाम करे ।।
सहस्रकृत्वः सावित्रीं शतकृत्वस्तु वा जपेत् ।
समाहितो जपेत् तस्मात् सावित्र्या चाभिमन्त्र्य च ।
मन्देहानां विनाशाय रक्षांसां विक्षिपेज्जलम् ।।
फिर एकाग्रचित्त होकर एक हजार या एक सौ गायत्री-मन्त्रका जप करे। मन्देह नामक राक्षसोंका नाश करनेके उद्देश्यसे गायत्री-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित जल लेकर सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे ।।
उद्गर्गोऽसीत्यथाचान्तः प्रायश्चित्तजलं क्षिपेत् ।।
इसके बाद आचमन करके 'उद्गर्गोऽसि' इस मन्त्रसे प्रायश्चित्तके लिये जल छोड़े ।।
अथादाय सुपुष्पाणि तोयमञ्जलिना द्विजः ।
प्रक्षिप्य प्रतिसूर्य च व्योममुद्रां प्रकल्पयेत् ।।
फिर द्विजको चाहिये कि अंजलिमें सुगन्धित पुष्प और जल लेकर सूर्यको अर्घ्य दे और आकाशमुद्राका प्रदर्शन करे ।।
ततो द्वादशकृत्वस्तु सूर्यस्यैकाक्षरं जपेत् ।
ततः षडक्षरादीनि षट्कृत्वः परिवर्तयेत् ।।
तदनन्तर सूर्यके एकाक्षर-मन्त्रका बारह बार जप करे और उनके षडक्षर आदि मन्त्रोंकी छः बार पुनरावृत्ति करे ।।
प्रदक्षिणं परामृष्य मुद्रया स्वमुखान्तरे ।
ऊर्ध्वबाहुस्ततो भूत्वा सूर्यमीक्षेत् समाहितः ।।
तन्मण्डलस्थं मां ध्यायेत् तेजोमूर्तिं चतुर्भुजम् ।
उदुत्यं च जपेन्मन्त्रं चित्रं तच्चक्षुरित्यपि ।।
सावित्रीं च यथाशक्ति जप्त्वा सूक्तं च मामकम् ।
मन्मयानि च सामानि पुरुषव्रतमेव च ।।
आकाशमुद्राको दाहिनी ओरसे घुमाकर अपने मुखमें विलीन करे। इसके बाद दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर एकाग्रचित्तसे सूर्यकी ओर देखते हुए उनके मण्डलमें स्थित मुझ चार भुजधारी तेजोमूर्ति नारायणका एकाग्रचित्तसे ध्यान करे। उस समय 'उदुत्यम्'<sup>१</sup>, 'चित्रं देवानाम्'<sup>२</sup> 'तच्चक्षुः'<sup>३</sup> इन मन्त्रोंका,