महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2148, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथाशक्ति गायत्री-मन्त्रका तथा मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले सूक्तोंका जप करके मेरे साममन्त्रों और पुरुषसूक्तका भी पाठ करे ।। ततश्चालोकयेदर्कं हंसः शुचिषदित्यपि । प्रदक्षिणं समावृत्य नमस्कृत्य दिवाकरम् ।। तत्पश्चात् 'हँसः शुचिषत्'<sup>४</sup> इस मन्त्रको पढ़कर सूर्यकी ओर देखे और प्रदक्षिणापूर्वक उन्हें नमस्कार करे ।। ततस्तु तर्पयेदद्भिर्ब्रह्माणं मां च शङ्करम् । प्रजापतिं च देवांश्च तथा देवमुनीनपि ।। साङ्गानपि तथा वेदानितिहासान् क्रतूनपि । पुराणानि च सर्वाणि कुलान्यप्सरसां तथा ।। ऋतून् संवत्सरं चैव कलाकाष्ठात्मकं तथा । भूतग्रामांश्च भूतानि सरितः सागरांस्तथा । शैलान् शैलस्थितान् देवानौषधीः सवनस्पतीः ।। तर्पयेदुपवीती च प्रत्येकं तृप्यतामिति । अन्वारभ्य च सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु ।। इस प्रकार संध्योपासन समाप्त होनेपर क्रमशः ब्रह्माजीका, मेरा, शंकरजीका, प्रजापतिका, देवताओं और देवर्षियोंका, अंगसहित वेदों, इतिहासों, यज्ञों और समस्त पुराणोंका, अप्सराओंका, ऋतु-कलाकाष्ठारूप संवत्सर तथा भूतसमुदायोंका, भूतोंका, नदियों और समुद्रोंका तथा पर्वतों, उनपर रहनेवाले देवताओं, ओषधियों और वनस्पतियोंका जलसे तर्पण करे। तर्पणके समय जनेऊको बायें कंधेपर रखे तथा दायें और बायें हाथकी अंजलिसे जल देते हुए उपर्युक्त देवताओंमेंसे प्रत्येकका नाम लेकर 'तृप्यताम्' पदका उच्चारण करे (यदि दो या अधिक देवताओंको एक साथ जल दिया जाय तो क्रमशः द्विवचन और बहुवचन—'तृप्येताम्' और 'तृप्यन्ताम्' इन पदोंका उच्चारण करना चाहिये) ।। निवीती तर्पयेद् विद्वानृषीन् मन्त्रकृतस्तथा । मरीच्यादीनृषींश्चैव नारदाद्यान् समाहितः ।। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि मन्त्रद्रष्टा मरीचि आदि तथा नारद आदि ऋषियोंको निवीती होकर अर्थात् जनेऊको गलेमें मालाकी भाँति पहन करके एकाग्रचित्तसे तर्पण करे ।। प्राचीनावीत्यथैतांस्तु तर्पयेद् देवताः पितॄन् । ततस्तु कव्यवाडग्निं सोमं वैवस्वतं तथा ।। ततश्चार्यमणं चापि ह्यग्निष्वात्तांस्तथैव च ।