महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2149, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोमपांश्चैव दर्भेषु सतिलैरेव वारिभिः ।
तृप्यतामिति पश्चात् तु स पितॄंस्तर्पयेत् ततः ।।
इसके बाद जनेऊको दाहिने कंधेपर करके आगे बताये जानेवाले पितृ-
सम्बन्धी देवताओं एवं पितरोंका तर्पण करे। कव्यवाट्, अग्नि, सोम, वैवस्वत,
अर्यमा, अग्निष्वात्त और सोमप—ये पितृ-सम्बन्धी देवता हैं। इनका तिलसहित
जलसे कुशाओंपर तर्पण करे और 'तृप्यताम्' पदका उच्चारण करे। तदनन्तर
पितरोंका तर्पण आरम्भ करे ।।
पितॄन् पितामहांश्चैव तथैव प्रपितामहान् ।
पितामहीस्तथा चापि तथैव प्रपितामहीः ।।
मातरं चात्मनश्चैव गुरुमाचार्यमेव च ।
पितृमातृस्वसारौ च तथा मातामहीमपि ।।
उपाध्यायान् सखीन् बन्धून् शिष्यर्त्विग्ज्ञातिबान्धवान् ।
प्रमीताननृशंस्यार्थं तर्पयेत् तानमत्सरः ।।
उनका क्रम इस प्रकार है—पिता, पितामह और प्रपितामह तथा अपनी
माता, पितामही और प्रपितामही! इनके सिवा गुरु, आचार्य, पितृष्वसा (बुआ),
मातृष्वसा (मौसी), मातामही, उपाध्याय, मित्र, बन्धु, शिष्य, ऋत्विज् और
जाति-भाई आदिमेंसे भी जो मर गये हों, उनपर दया करके ईर्ष्या-द्वेष त्यागकर
उनका भी तर्पण करना चाहिये ।।
तर्पयित्वा तथाऽऽचम्य स्नानवस्त्रं प्रपीडयेत् ।
वृत्तिं भृत्यजनस्याहुः स्नानं पानं च तद्विदः ।
अतर्पयित्वा तान् पूर्वं स्नानवस्त्रं न पीडयेत् ।
पीडयेच्च पुरा मोहाद् देवाः सर्षिगणास्तथा ।।
तर्पणके पश्चात् आचमन करके स्नानके समय पहने हुए वस्त्रको निचोड़
डाले। उस वस्त्रका जल भी कुलके मरे हुए संतानहीन पुरुषोंका भाग है। वह
उनके स्नान करने और पीनेके काम आता है। अतः उस जलसे उनका तर्पण
करना चाहिये, ऐसा विद्वानोंका कथन है। पूर्वोक्त देवताओं तथा पितरोंका तर्पण
किये बिना स्नानका वस्त्र नहीं धोना चाहिये। जो मोहवश तर्पणके पहले ही
धौतवस्त्रको धो लेता है, वह ऋषियों और देवताओंको कष्ट पहुँचाता है ।।
तर्पयित्वा तथाऽऽचम्य स्नानवस्त्रं निपीडयेत् ।
पितरस्तु निराशास्ते शप्त्वा यान्ति यथागतम् ।।
उस अवस्थामें उसके पितर उसे शाप देकर निराश लौट जाते हैं, इसलिये
तर्पणके पश्चात् आचमन करके ही स्नान-वस्त्र निचोड़ना चाहिये ।।
प्रक्षाल्य तु मृदा पादावाचम्य प्रयतः पुनः ।