महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्भेषु दर्भपाणिः सन् स्वाध्यायं तु समारभेत् ।। तर्पणकी क्रिया पूर्ण होनेपर दोनों पैरोंमें मिट्टी लगाकर उन्हें धो डाले और फिर आचमन करके पवित्र हो कुशासनपर बैठ जाय और हाथोंमें कुशा लेकर स्वाध्याय आरम्भ करे ।।
वेदमादौ समारभ्य ततो पर्युपरि क्रमात् । यदधीतेऽन्वहं शक्त्या तत् स्वाध्यायं प्रचक्षते ।। पहले वेदका पाठ करके फिर क्रमसे उसके अन्य अंगोंका अध्ययन करे। अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिन जो अध्ययन किया जाता है, उसको स्वाध्याय कहते हैं ।।
ऋचो वापि यजुर्वापि सामगायमथापि च । इतिहासपुराणानि यथाशक्ति न हापयेत् ।। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदका स्वाध्याय करे। इतिहास और पुराणोंके अध्ययनको भी यथाशक्ति न छोड़े ।।
उत्थाय तु नमस्कृत्य दिशो दिग्देवता अपि । ब्रह्माणं च ततश्चाग्निं पृथिवीमोषधीस्तथा ।। वाचं वाचस्पतिं चैव मां चैव सरितस्तथा । नमस्कृत्य तथाद्भिस्तु प्रणवादि च पूर्ववत् ।। ततो नमोऽद्भ्य इत्युक्त्वा नमस्कुर्यात् तु तज्जलम् । स्वाध्याय पूर्ण करके खड़ा होकर दिशाओं, उनके देवताओं, ब्रह्माजी, अग्नि, पृथ्वी, ओषधि, वाणी, वाचस्पति और सरिताओंको तथा मुझे भी प्रणाम करे। फिर जल लेकर प्रणवयुक्त ‘नमोऽद्भ्यः’ यह मन्त्र पढ़कर पूर्ववत् जलदेवताको नमस्कार करे ।।
घृणिः सूर्यस्तथाऽऽदित्यस्तं प्रणम्य स्वमूर्धनि ।। ततस्त्वालोकयन्नर्कं प्रणवेन समाहितः । ततो मामर्चयेत् पुष्पैर्मत्प्रियैरेव नित्यशः ।। इसके बाद घृणि, सूर्य तथा आदित्य आदि नामोंका उच्चारण करके अपने मस्तकपर दोनों हाथ जोड़कर सूर्यदेवको प्रणाम करे और प्रणवका जप करते हुए एकाग्रचित्तसे उनका दर्शन करे। उसके बाद मुझे प्रिय लगनेवाले पुष्पोंसे नित्यप्रति मेरी पूजा करे ।।
युधिष्ठिर उवाच
त्वत्प्रियाणि प्रसूनानि त्वदधिष्ठानि माधव । सर्वाण्याचक्ष्व देवेश त्वद्भक्तस्य ममाच्युत ।।