भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2151, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2151

**युधिष्ठिरने कहा—**अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले माधव! जो पुष्प आपको अत्यन्त प्रिय हों तथा जिनमें आपका निवास हो, उन सबका मुझ अपने भक्तसे वर्णन कीजिये॥

श्रीभगवानुवाच

शृणुष्वावहितो राजन् पुष्पाणि प्रियकृन्ति मे ।
कुमुदं करवीरं च चणकं चम्पकं तथा ॥
मल्लिकाजातिपुष्पं च नन्द्यावर्तं च नन्दिकम् ।
पलाशपुष्पपत्राणि दूर्वाभृङ्गकमेव च ॥
वनमाला च राजेन्द्र मत्प्रियाणि विशेषतः ।
**श्रीभगवान् बोले—**राजन्! जो फूल मुझे बहुत प्रिय हैं, उनके नाम बताता हूँ, सावधान होकर सुनो। राजेन्द्र! कुमुद, करवीर, चणक, चम्पा, मालती, जातिपुष्प, नन्द्यावर्त, नन्दिक, पलाशके फूल और पत्ते, दूर्वा, भृंगक और वनमाला—ये फूल मुझे विशेष प्रिय हैं॥
सर्वेषामपि पुष्पाणां सहस्रगुणमुत्पलम् ॥
तस्मात् पद्मं तथा राजन् पद्मात् तु शतपत्रकम् ।
तस्मात् सहस्रपत्रं तु पुण्डरीकं ततः परम् ॥
पुण्डरीकसहस्रात् तु तुलसी गुणतोऽधिका ।
सब प्रकारके फूलोंसे हजार गुना अच्छा उत्पल माना गया है। राजन्! उत्पलसे बढ़कर पद्म, पद्मसे शतदल, शतदलसे सहस्रदल, सहस्रदलसे पुण्डरीक और हजार पुण्डरीकसे बढ़कर तुलसीका गुण माना गया है॥
वकपुष्पं ततस्तस्मात् सौवर्णं तु ततोऽधिकम् ।
सौवर्णात् तु प्रसूनाच्च मत्प्रियं नास्ति पाण्डव ॥
पाण्डुनन्दन! तुलसीसे श्रेष्ठ है वकपुष्प और उससे भी उत्तम है सौवर्ण, सौवर्णके फूलसे बढ़कर दूसरा कोई भी फूल मुझे प्रिय नहीं है॥
पुष्पाभावे तुलस्यास्तु पत्रैर्मामर्चयेत् पुनः ।
पत्रालाभे तु शाखाभिः शाखालाभे शिफालवैः ॥
शिफाभावे मृदा तत्र भक्तिमानर्चयेत माम् ।
फूल न मिलनेपर तुलसीके पत्तोंसे, पत्तोंके न मिलनेपर उसकी शाखाओंसे और शाखाओंके न मिलनेपर तुलसीकी जड़के टुकड़ोंसे मेरी पूजा करे। यदि वह भी न मिल सके तो जहाँ तुलसीका वृक्ष रहा हो, वहाँकी मिट्टीसे ही भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करे॥
वर्जनीयानि पुष्पाणि शृणु राजन् समाहितः ॥