महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिंकिणीं मुनिपुष्पं च धुर्धूरं पाटलं तथा ।।
तथातिमुक्तकं चैव पुन्नागं नक्तमालिकम् ।
यौधिकं क्षीरिकापुष्पं निर्गुण्डी लांगुली जपाः ।।
कर्णिकारं तथाशोकं शाल्मलीपुष्पमेव च ।
ककुभाः कोविदाराश्च वैभीतकमथापि च ।।
कुरण्टकप्रसूनं च कल्पकं कालकं तथा ।
अङ्कोलं गिरिकर्णी च नीलान्येव च सर्वशः ।
एकपर्णानि चान्यानि सर्वाण्येव विवर्जयेत् ।।
राजन्! अब त्यागनेयोग्य फूलोंके नाम बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो। किंकिणी, मुनिपुष्प, धुर्धुर, पाटल, अतिमुक्तक, पुन्नाग, नक्तमालिक, यौधिक, क्षीरिकापुष्प, निर्गुण्डी, लांगुली, जपा, कर्णिकार, अशोक, सेमलका फूल, ककुभ, कोविदार, वैभीतक, कुरण्टक, कल्पक, कालक, अंकोल, गिरिकर्णी, नीले रंगके फूल तथा एक पंखड़ीवाले फूल—इन सबका सब प्रकारसे त्याग कर देना चाहिये ।।
अर्कपुष्पाणि वर्ज्यानि अर्कपत्रस्थितानि च ।
व्याधृताः पिचुमन्दानि सर्वाण्येव विवर्जयेत् ।।
आक (मदार)-के फूल तथा आकके पत्तेपर रखे हुए फूल भी वर्जित हैं। नीमके फूलोंका भी परित्याग कर देना चाहिये ।।
अन्यैस्तु शुक्लपत्रैस्तु गन्धवद्भिर्नराधिप ।
अवर्ज्यैस्तैर्यथालाभं मद्भक्तो मां समर्चयेत् ।।
नराधिप! इनके अतिरिक्त जिनका निषेध नहीं किया गया है, ऐसे सफेद पंखड़ियोंवाले सुगन्धित पुष्प जितने मिल सकें, उनके द्वारा भक्त पुरुषको मेरी पूजा करनी चाहिये ।।
युधिष्ठिर उवाच
कथं त्वमर्चनीयोऽसि मूर्तयः कीदृशास्तु ते ।
वैखानसाः कथं ब्रूयुः कथं वा पाञ्चरात्रिकाः ।।
युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आपकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये? आपकी मूर्तियाँ कैसी हैं? इस विषयमें वानप्रस्थलोग किस प्रकार बताते हैं और पञ्चरात्रवाले किस प्रकार बताते हैं? ।।
श्रीभगवानुवाच
शृणु पाण्डव तत्सर्वमर्चनाक्रममात्मनः ।
स्थण्डिले पद्मकं कृत्वा चाष्टपत्रं सकर्णिकम् ।।