महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाक्षरविधानेन ह्यथवा द्वादशाक्षरैः । वैदिकैरथ मन्त्रैश्च मम सूक्तेन वा पुनः ॥ स्थापितं मां ततस्तस्मिन्नर्चयित्वा विचक्षणः । पुरुषं च ततः सत्यमच्युतं च युधिष्ठिर ॥ श्रीभगवान् बोले—पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर! मेरे अर्चनकी सब विधि सुनो। वेदीपर कर्णिकाओंसे युक्त अष्टदल कमल बनावे। उसपर अष्टाक्षर अथवा द्वादशाक्षर मन्त्रके विधानसे तथा वैदिक मन्त्रोंके द्वारा और पुरुषसूक्तसे मेरी मूर्तिकी स्थापना करे। फिर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि मुझ सत्यस्वरूप अच्युत पुरुषका पूजन करे ।।
अनिरुद्धं च मां प्राहुर्वैखानसविदो जनाः । अन्ये त्वेवं विजानन्ति मां राजन् पाञ्चरात्रिकाः ॥ वासुदेवं च राजेन्द्र सङ्कर्षणमथापि वा । प्रद्युम्नं चानिरुद्धं च चतुर्मूर्तिं प्रवक्ष्यते ॥ नृपश्रेष्ठ महाराज! वानप्रस्थ-धर्मके ज्ञाता मनुष्य मुझे अनिरुद्ध स्वरूप बताते हैं। उनसे भिन्न जो पाञ्चरात्रिक हैं, वे मुझे वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इस प्रकार चतुर्व्यूह-स्वरूप बताते हैं ॥
एताश्चान्याश्च राजेन्द्र संज्ञाभेदेन मूर्तयः । विद्ध्यनर्थान्तरा एव मामेवं चार्चयेद् बुधः ॥ राजेन्द्र! ये सभी तथा अन्य नामभेदसे मेरी मूर्तियाँ हैं, उन सबका अर्थ एक ही समझना चाहिये। इस प्रकार बुद्धिमान् लोग मेरी पूजा करते हैं ॥
युधिष्ठिर उवाच
त्वद्भक्ताः कीदृशा देव कानि तेषां व्रतानि च । एतत् कथय देवेश त्वद्भक्तस्य ममाच्युत ॥ युधिष्ठिरने पूछा—अच्युत! भगवन्! आपके भक्त कैसे होते हैं और उनके नियम कौन-कौन-से हैं? यह बतानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि देवेश्वर! मैं भी आपके चरणोंमें भक्ति रखता हूँ ॥
श्रीभगवानुवाच
अनन्यदेवताभक्ता ये मद्भक्तजनप्रियाः । मामेव शरणं प्राप्ता मद्भक्तास्ते प्रकीर्तिताः ॥ श्रीभगवान्ने कहा—राजन्! जो दूसरे किसी देवताके भक्त न होकर केवल मेरी ही शरण ले चुके हों तथा मेरे भक्तजनोंके साथ प्रेम रखते हों, वे ही मेरे भक्त कहे गये हैं ॥