महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
किंकिणीं मुनिपुष्पं च धुर्धूरं पाटलं तथा ।।
तथातिमुक्तकं चैव पुन्नागं नक्तमालिकम् ।
यौधिकं क्षीरिकापुष्पं निर्गुण्डी लांगुली जपाः ।।
कर्णिकारं तथाशोकं शाल्मलीपुष्पमेव च ।
ककुभाः कोविदाराश्च वैभीतकमथापि च ।।
कुरण्टकप्रसूनं च कल्पकं कालकं तथा ।
अङ्कोलं गिरिकर्णी च नीलान्येव च सर्वशः ।
एकपर्णानि चान्यानि सर्वाण्येव विवर्जयेत् ।।
राजन्! अब त्यागनेयोग्य फूलोंके नाम बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो। किंकिणी, मुनिपुष्प, धुर्धुर, पाटल, अतिमुक्तक, पुन्नाग, नक्तमालिक, यौधिक, क्षीरिकापुष्प, निर्गुण्डी, लांगुली, जपा, कर्णिकार, अशोक, सेमलका फूल, ककुभ, कोविदार, वैभीतक, कुरण्टक, कल्पक, कालक, अंकोल, गिरिकर्णी, नीले रंगके फूल तथा एक पंखड़ीवाले फूल—इन सबका सब प्रकारसे त्याग कर देना चाहिये ।।
अर्कपुष्पाणि वर्ज्यानि अर्कपत्रस्थितानि च ।
व्याधृताः पिचुमन्दानि सर्वाण्येव विवर्जयेत् ।।
आक (मदार)-के फूल तथा आकके पत्तेपर रखे हुए फूल भी वर्जित हैं। नीमके फूलोंका भी परित्याग कर देना चाहिये ।।
अन्यैस्तु शुक्लपत्रैस्तु गन्धवद्भिर्नराधिप ।
अवर्ज्यैस्तैर्यथालाभं मद्भक्तो मां समर्चयेत् ।।
नराधिप! इनके अतिरिक्त जिनका निषेध नहीं किया गया है, ऐसे सफेद पंखड़ियोंवाले सुगन्धित पुष्प जितने मिल सकें, उनके द्वारा भक्त पुरुषको मेरी पूजा करनी चाहिये ।।
युधिष्ठिर उवाच
कथं त्वमर्चनीयोऽसि मूर्तयः कीदृशास्तु ते ।
वैखानसाः कथं ब्रूयुः कथं वा पाञ्चरात्रिकाः ।।
युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आपकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये? आपकी मूर्तियाँ कैसी हैं? इस विषयमें वानप्रस्थलोग किस प्रकार बताते हैं और पञ्चरात्रवाले किस प्रकार बताते हैं? ।।
श्रीभगवानुवाच
शृणु पाण्डव तत्सर्वमर्चनाक्रममात्मनः ।
स्थण्डिले पद्मकं कृत्वा चाष्टपत्रं सकर्णिकम् ।।
अष्टाक्षरविधानेन ह्यथवा द्वादशाक्षरैः । वैदिकैरथ मन्त्रैश्च मम सूक्तेन वा पुनः ॥ स्थापितं मां ततस्तस्मिन्नर्चयित्वा विचक्षणः । पुरुषं च ततः सत्यमच्युतं च युधिष्ठिर ॥ श्रीभगवान् बोले—पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर! मेरे अर्चनकी सब विधि सुनो। वेदीपर कर्णिकाओंसे युक्त अष्टदल कमल बनावे। उसपर अष्टाक्षर अथवा द्वादशाक्षर मन्त्रके विधानसे तथा वैदिक मन्त्रोंके द्वारा और पुरुषसूक्तसे मेरी मूर्तिकी स्थापना करे। फिर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि मुझ सत्यस्वरूप अच्युत पुरुषका पूजन करे ।।
अनिरुद्धं च मां प्राहुर्वैखानसविदो जनाः । अन्ये त्वेवं विजानन्ति मां राजन् पाञ्चरात्रिकाः ॥ वासुदेवं च राजेन्द्र सङ्कर्षणमथापि वा । प्रद्युम्नं चानिरुद्धं च चतुर्मूर्तिं प्रवक्ष्यते ॥ नृपश्रेष्ठ महाराज! वानप्रस्थ-धर्मके ज्ञाता मनुष्य मुझे अनिरुद्ध स्वरूप बताते हैं। उनसे भिन्न जो पाञ्चरात्रिक हैं, वे मुझे वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इस प्रकार चतुर्व्यूह-स्वरूप बताते हैं ॥
एताश्चान्याश्च राजेन्द्र संज्ञाभेदेन मूर्तयः । विद्ध्यनर्थान्तरा एव मामेवं चार्चयेद् बुधः ॥ राजेन्द्र! ये सभी तथा अन्य नामभेदसे मेरी मूर्तियाँ हैं, उन सबका अर्थ एक ही समझना चाहिये। इस प्रकार बुद्धिमान् लोग मेरी पूजा करते हैं ॥
युधिष्ठिर उवाच
त्वद्भक्ताः कीदृशा देव कानि तेषां व्रतानि च । एतत् कथय देवेश त्वद्भक्तस्य ममाच्युत ॥ युधिष्ठिरने पूछा—अच्युत! भगवन्! आपके भक्त कैसे होते हैं और उनके नियम कौन-कौन-से हैं? यह बतानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि देवेश्वर! मैं भी आपके चरणोंमें भक्ति रखता हूँ ॥
श्रीभगवानुवाच
अनन्यदेवताभक्ता ये मद्भक्तजनप्रियाः । मामेव शरणं प्राप्ता मद्भक्तास्ते प्रकीर्तिताः ॥ श्रीभगवान्ने कहा—राजन्! जो दूसरे किसी देवताके भक्त न होकर केवल मेरी ही शरण ले चुके हों तथा मेरे भक्तजनोंके साथ प्रेम रखते हों, वे ही मेरे भक्त कहे गये हैं ॥
स्वर्ग्याण्यपि यशस्यानि मत्प्रियाणि विशेषतः । मद्भक्तः पाण्डवश्रेष्ठ व्रतानीमानि धारयेत् ॥ पाण्डवश्रेष्ठ! स्वर्ग और यश देनेवाले होनेके साथ ही जो मुझे विशेष प्रिय हों, ऐसे व्रतोंका ही मेरे भक्त पालन करते हैं ।।
नान्यदाच्छादयेद् वस्त्रं मद्भक्तो जलतारणे । स्वस्थस्तु न दिवा स्वप्नेन्मधुमांसानि वर्जयेत् ॥ भक्त पुरुषको जलमें तैरते समय एक वस्त्रके सिवा दूसरा नहीं धारण करना चाहिये। स्वस्थ रहते हुए दिनमें कभी नहीं सोना चाहिये। मधु और मांसको त्याग देना चाहिये ।।
प्रदक्षिणं व्रजेद् विप्रान् गामश्वत्थं हुताशनम् । न धावेत् पतिते वर्षे नाग्रभिक्षां च लोपयेत् ॥ मार्गमें ब्राह्मण, गौ, पीपल और अग्निके मिलनेपर उनको दाहिने करके जाना चाहिये। पानी बरसते समय दौड़ना नहीं चाहिये। पहले मिलनेवाली भिक्षाका त्याग नहीं करना चाहिये ।।
प्रत्यक्षलवणं नाद्यात् सौभाञ्जनकरञ्जनौ । ग्रासमुष्टिं गवे दद्याद् धान्याम्लं चैव वर्जयेत् ॥ खाली नमक नहीं खाना चाहिये तथा सौभांजन और करंजनका भक्षण नहीं करना चाहिये। गौको प्रतिदिन ग्रास अर्पण करे और अन्नमें खटाई मिलाकर न खाय ।।
तथा पर्युषितं चापि पक्वं परगृहागतम् । अनिवेदितं च यद् द्रव्यं तत् प्रयत्नेन वर्जयेत् ॥ दूसरेके घरसे उठाकर आयी हुई रसोई, बासी अन्न तथा भगवान्को भोग न लगाये हुए पदार्थका भी प्रयत्नपूर्वक त्याग करे ।।
विभीतककरञ्जानां छायां दूरे विवर्जयेत् । विप्रदेवपरीवादान् न वदेत् पीडितोऽपि सन् ॥ बहेड़े और करंजकी छायासे दूर रहे, कष्टमें पड़नेपर भी ब्राह्मणों और देवताओंकी निन्दा न करे ।।
उदिते सवितर्याप्य क्रियायुक्तस्य धीमतः । चतुर्वेदविदश्चापि देहे षड् वृषलाः स्मृताः ॥ सूर्योदयके बाद नित्य क्रियाशील रहनेवाले बुद्धिमान् और चारों वेदोंके विद्वान् ब्राह्मणके शरीरमें भी छः वृषल बताये जाते हैं ।।
क्षत्रियाः सप्त विज्ञेया वैश्यास्त्वष्टौ प्रकीर्तिताः । नियताः पाण्डवश्रेष्ठ शूद्राणामेकविंशतिः ॥
पाण्डवश्रेष्ठ! क्षत्रियोंके शरीरमें सात वृषल जानने चाहिये, वैश्योंके देहमें आठ वृषल बताये गये हैं और शूद्रोंमें इक्कीस वृषलोंका निवास माना गया है ।।
कामः क्रोधश्च लोभश्च मोहश्च मद एव च ।
महामोहश्च इत्येते देहे षड् वृषलाः स्मृताः ।।
काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और महामोह—ये छः वृषल ब्राह्मणके शरीरमें स्थित बताये गये हैं ।।
गर्वः स्तम्भो ह्यहंकार ईर्ष्या च द्रोह एव च ।
पारुष्यं क्रूरता चैव सप्तैते क्षत्रियाः स्मृताः ।।
गर्व, स्तम्भ (जडता), अहंकार, ईर्ष्या, द्रोह, पारुष्य (कठोर बोलना) और क्रूरता—ये सात क्षत्रिय-शरीरमें रहनेवाले वृषल हैं ।।
तीक्ष्णतानिकृतिर्माया शाठ्यं दम्भो ह्यनार्जवम् ।
पैशुन्यमनृतं चैव वैश्यास्त्वष्टौ प्रकीर्तिताः ।।
तीक्ष्णता, कपट, माया, शठता, दम्भ, सरलताका अभाव, चुगली और असत्य-भाषण—ये आठ वैश्य-शरीरके वृषल हैं ।।
तृष्णा बुभुक्षा निद्रा च ह्याल्स्यं चाघृणादयः ।
आधिश्चापि विषादश्च प्रमादो हीनसत्त्वता ।।
भयं विक्लवता जाड्यं पापकं मन्युरेव च ।
आशा चाश्रद्धधानत्वमनवस्थाप्ययन्त्रणम् ।।
आशौचं मलिनत्वं च शूद्रा ह्येते प्रकीर्तिताः ।
यस्मिन्नेते न दृश्यन्ते स वै ब्राह्मण उच्यते ।।
तृष्णा, खानेकी इच्छा, निद्रा, आलस्य, निर्दयता, क्रूरता, मानसिक चिन्ता, विषाद, प्रमाद, अधीरता, भय, घबराहट, जडता, पाप, क्रोध, आशा, अश्रद्धा, अनवस्था, निरंकुशता, अपवित्रता और मलिनता—ये इक्कीस वृषल शूद्रके शरीरमें रहनेवाले बताये गये हैं। ये सभी वृषल जिसके भीतर न दिखायी दें, वही वास्तवमें ब्राह्मण कहलाता है ।।
तस्मात् तु सात्त्विको भूत्वा शुचिः क्रोधविवर्जितः ।
मामर्चयेत् तु सततं मत्प्रियत्वं यदिच्छति ।।
अतः ब्राह्मण यदि मेरा प्रिय होना चाहे तो सात्त्विक, पवित्र और क्रोधहीन होकर सदा मेरी पूजा करता रहे ।।
अलोलजिह्वः समुपस्थितो धृतिं
निधाय चक्षुर्युगमात्रमेव तत् ।
मनश्च वाचं च निगृह्य चञ्चलं
भयान्निवृत्तो मम भक्त उच्यते ।।
जिसकी जिह्वा चंचल नहीं है, जो धैर्य धारण किये रहता है और चार हाथ आगेतक दृष्टि रखते हुए चलता है, जिसने अपने चंचल मन और वाणीको वशमें करके भयसे छुटकारा पा लिया है, वह मेरा भक्त कहलाता है ।।
ईदृशाध्यात्मिनो ये तु ब्राह्मणा नियतेन्द्रियाः ।
तेषां श्राद्धेषु तृप्यन्ति तेन तृप्ताः पितामहाः ।।
ऐसे अध्यात्मज्ञानसे युक्त जितेन्द्रिय ब्राह्मण जिनके यहाँ श्राद्धमें तृप्तिपूर्वक भोजन करते हैं, उनके पितर उस भोजनसे पूर्ण तृप्त होते हैं ।।
धर्मो जयति नाधर्मः सत्यं जयति नानृतम् ।
क्षमा जयति न क्रोधः क्षमावान् ब्राह्मणो भवेत् ।।
धर्मकी जय होती है, अधर्मकी नहीं; सत्यकी विजय होती है, असत्यकी नहीं तथा क्षमाकी जीत होती है, क्रोधकी नहीं। इसलिये ब्राह्मणको क्षमाशील होना चाहिये ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
१. ॐ आपः पुनन्तु पृथिवीं पृथिवी पूता पुनातु माम् । पुनन्तु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मपूता पुनातु माम् ।।
यदुच्छिष्टमभोज्यं च यद्वा दुश्चरितं मम । सर्वं पुनन्तु मामापोऽसतां च प्रतिग्रहँस्वाहा ।।
(तै० आ० प्र० १०।२३)
२. सदसस्पतिमद्भुतमप्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । सनिम्मेधा मयासिषँस्वाहा ।।
(यजु० अ० ३२ मं० १३)
३. ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्यपाँसुरे स्वाहा ।।
(यजु० अ० ५ मं १५)
१. ॐआपो हि ष्ठा मयोभुवः। ॐ ता न ऊर्जे दधातन। ॐ महे रणाय चक्षसे। ॐ यो वः शिवतमो रसः। ॐ तस्य भाजयतेह नः। ॐ उशतीरिव मातरः। ॐ तस्मा अरंगमाम वः। ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ। ॐ आपो जनयथा च नः।
(यजु० ११ मं० ५०—५२)
२. ॐ ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत । ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः । समुद्रादर्णवादधिसंवत्सरो अजायत । अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी । सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्वः ।।
(ऋ० अ० ८अ० ८व० ४८)
१. ॐ उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्यम् ।। (यजु० अ० ७ मं० ४१)
२. ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः । आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षँसूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ।। (यजु० अ० ७ मं० ४२)
३. ॐ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतँशृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ।। (यजु० अ० ३६ मं० २४)
४. हँसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदृतसद्व्योम सदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ।। (यजु० १०।२४)
[कपिला गौका तथा उसके दानका माहात्म्य और कपिला गौके दस भेद]
[कपिला गौका तथा उसके दानका माहात्म्य और कपिला गौके दस भेद]
वैशम्पायन उवाच
दानपुण्यफलं श्रुत्वा तपःपुण्यफलानि च ।
धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! दान और तपस्याके पुण्य-फलको सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे पूछा— ॥
या चैषा कपिला देव पूर्वमुत्पादिता विभो ।
होमधेनुः सदा पुण्या चतुर्वक्त्रेण माधव ॥
सा कथं ब्राह्मणेभ्यो हि देया कस्मिन् दिनेऽपि वा ।
कीदृशाय च विप्राय दातव्या पुण्यलक्षणा ॥
'भगवन्! विभो! जिसे ब्रह्माजीने अग्निहोत्रकी सिद्धिके लिये पूर्वकालमें उत्पन्न किया था तथा जो सदा ही पवित्र मानी गयी है, उस कपिला गौका ब्राह्मणोंको किस प्रकार दान करना चाहिये? माधव! वह पवित्र लक्षणोंवाली गौ किस दिन और कैसे ब्राह्मणको देनी चाहिये? ॥
कति वा कपिला प्रोक्ता स्वयमेव स्वयम्भुवा ।
कैर्वा देयाश्च ता देव श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
'ब्रह्माजीने कपिला गौके कितने भेद बतलाये हैं तथा कपिला गौका दान करनेवाला मनुष्य कैसा होना चाहिये? इन सब बातोंको मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ' ॥
एवमुक्तो हृषीकेशो धर्मपुत्रेण संसदि ।
अब्रवीत् कपिलासंख्यां तासां माहात्म्यमेव च ॥
धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके द्वारा सभामें इस प्रकार कहे जानेपर श्रीकृष्ण कपिला गौकी संख्या और उनकी महिमाका वर्णन करने लगे— ॥
शृणु पाण्डव तत्त्वेन पवित्रं पावनं परम् ।
यच्छ्रुत्वा पापकर्मापि नरः पापात् प्रमुच्यते ॥
'पाण्डुनन्दन! यह विषय बड़ा ही पवित्र और पावन है। इसका श्रवण करनेसे पापी पुरुष भी पापसे मुक्त हो जाता है, अतः ध्यान देकर सुनो ॥
कपिला ह्यग्निहोत्रार्थे विप्रार्थे वा स्वयम्भुवा ।
सर्वं तेजाः समुद्धृत्य निर्मिता ब्रह्मणा पुरा ॥
'पूर्वकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने अग्निहोत्र तथा ब्राह्मणोंके लिये सम्पूर्ण तेजोंका संग्रह करके कपिला गौको उत्पन्न किया था ॥
पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
पुण्यानां परमं पुण्यं कपिला पाण्डुनन्दन ॥
'पाण्डुनन्दन! कपिला गौ पवित्र वस्तुओंमें सबसे बढ़कर पवित्र, मंगलजनक पदार्थोंमें सबसे अधिक मंगलस्वरूपा तथा पुण्योंमें परमपुण्यस्वरूपा है ।। तपसां तप एवाग्र्यं व्रतानामुत्तमं व्रतम् । दानानां परमं दानं निदानं ह्येतदक्षयम् ।। 'वह तपस्याओंमें श्रेष्ठ तपस्या, व्रतोंमें उत्तम व्रत, दानोंमें श्रेष्ठ दान और सबका अक्षय कारण है ।। क्षीरेण कपिलायास्तु दध्ना वा सघृतेन वा । होतव्यान्यग्निहोत्राणि सायं प्रातर्द्विजातिभिः । 'द्विजातियोंको चाहिये कि वे सायंकाल और प्रातःकालमें कपिला गौके दूध, दही अथवा घीसे अग्निहोत्र करें ।। कपिलाया घृतेनापि दध्ना क्षीरेण वा पुनः । जुह्वते येऽग्निहोत्राणि ब्राह्मणा विधिवत् प्रभो ।। पूजयन्त्यतिथींश्चैव परां भक्तिमुपागताः । शूद्रान्नाद् विरता नित्यं दम्भानृतविवर्जिताः ।। ते यान्त्यादित्यसंकाशैर्विमानैर्द्विजसत्तमाः । सूर्यमण्डलमध्येन ब्रह्मलोकमनुत्तमम् ।। 'प्रभो! जो ब्राह्मण कपिला गौके घी, दही अथवा दूधसे विधिवत् अग्निहोत्र करते हैं, भक्तिपूर्वक अतिथियोंकी पूजा करते हैं, शूद्रके अन्नसे दूर रहते हैं तथा दम्भ और असत्यका सदा त्याग करते हैं, वे सूर्यके समान तेजस्वी विमानोंद्वारा सूर्यमण्डलके बीचसे होकर परम उत्तम ब्रह्मलोकमें जाते हैं ।। शृङ्गाग्रे कपिलायास्तु सर्वतीर्थानि पाण्डव । ब्रह्मणो हि नियोगेन निवसन्ति दिने दिने ।। प्रातरुत्थाय यो मर्त्यः कपिलाशृङ्गमस्तकात् । यश्च्युतामम्बुधारां वै शिरसा प्रयतः शुचिः ।। स तेन पुण्यतीर्थेन सहसा हतकिल्बिषः । जन्मत्रयकृतं पापं प्रदहत्यग्निवत् तृणम् ।। 'युधिष्ठिर! ब्रह्माजीकी आज्ञासे कपिलाके सींगके अग्रभागमें सदा सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं। जो मनुष्य शुद्धभावसे नियमपूर्वक प्रतिदिन सबेरे उठकर कपिला गौके सींग और मस्तकसे गिरती हुई जलधाराको अपने सिरपर धारण करता है, वह उस पुण्यके प्रभावसे सहसा पापरहित हो जाता है। जैसे आग तिनकेको जला डालती है, उसी प्रकार वह जल मनुष्यके तीन जन्मोंके पापोंको भस्म कर डालता है ।। मूत्रेण कपिलायास्तु यश्च प्राणानुपस्पृशेत् । स्नानेन तेन पुण्येन नष्टपापः स मानवः ।
त्रिंशद् वर्षकृतात् पापान्मुच्यते नात्र संशयः ॥ 'जो मनुष्य कपिलाका मूत्र लेकर अपनी नेत्र आदि इन्द्रियोंमें लगाता तथा उससे स्नान करता है, वह उस स्नानके पुण्यसे निष्पाप हो जाता है। उसके तीस जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है ।। प्रातरुत्थाय यो भक्त्या प्रयच्छेत् तृणमुष्टिकम् । तस्य नश्यति तत् पापं त्रिंशद्रात्रकृतं नृप ॥ 'नरपते! जो प्रातःकाल उठकर भक्तिके साथ कपिला गौको घासकी मुट्ठी अर्पण करता है, उसके एक महीनेके पापोंका नाश हो जाता है ।। प्रातरुत्थाय यद्भक्त्या कुर्याद् यस्मात् प्रदक्षिणम् । प्रदक्षिणीकृता तेन पृथिवी नात्र संशयः ।। 'जो सबेरे शयनसे उठकर भक्तिपूर्वक कपिला गौकी परिक्रमा करता है, उसके द्वारा समूची पृथिवीकी परिक्रमा हो जाती है, इसमें संशय नहीं है' ।। कपिलापञ्चगव्येन यः स्नायात् तु शुचिर्नरः । स गङ्गाद्येषु तीर्थेषु स्नातो भवति पाण्डव ॥ 'पाण्डुनन्दन! जो पुरुष कपिला गौके पञ्चगव्यसे नहाकर शुद्ध होता है, वह मानो गंगा आदि समस्त तीर्थोंमें स्नान कर लेता है ।। दृष्ट्वा तु कपिलां भक्त्या श्रुत्वा हुंकारनिःस्वनम् । व्यपोहति नरः पापमहोरात्रकृतं नृप ।। 'राजन्! भक्तिपूर्वक कपिला गौका दर्शन करके तथा उसके रँभानेकी आवाज सुनकर मनुष्य एक दिन-रातके पापोंको नष्ट कर डालता है ।। गोसहस्रं तु यो दद्यादेकां च कपिलां नरः । समं तस्य फलं प्राह ब्रह्मा लोकपितामहः ।। 'एक मनुष्य एक हजार गौओंका दान करे और दूसरा एक ही कपिला गौको दानमें दे तो लोकपितामह ब्रह्माजीने उन दोनोंका फल बराबर बतलाया है ।। यस्त्वेवं कपिलां हन्यान्नरः कश्चित् प्रमादतः । गोसहस्रं हतं तेन भवेन्नात्र विचारणा ।। 'इसी प्रकार कोई मनुष्य प्रमादवश यदि एक ही कपिला गौकी हत्या कर डाले तो उसे एक हजार गौओंके वधका पाप लगता है, इसमें संशय नहीं है ।। दश वै कपिलाः प्रोक्ताः स्वयमेव स्वयम्भुवा । प्रथमा स्वर्णकपिला द्वितीया गौरपिङ्गला । तृतीया रक्तपिङ्गाक्षी चतुर्थी गलपिङ्गला ।। पञ्चमी बभ्रुवर्णाभा षष्ठी च श्वेतपिङ्गला । सप्तमी रक्तपिङ्गाक्षी त्वष्टमी खुरपिङ्गला ।।
नवमी पाटला ज्ञेया दशमी पुच्छपिङ्गला । दशैताः कपिलाः प्रोक्तास्तारयन्ति नरान् सदा ॥ ‘ब्रह्माजीने कपिला गौके दस भेद बतलाये हैं। पहली स्वर्णकपिला१, दूसरी गौरपिंगला२, तीसरी आरक्तपिंगाक्षी३, चौथी गलपिंगला४, पाँचवीं बभ्रुवर्णाभा५, छठी श्वेतपिंगला६, सातवीं रक्तपिंगाक्षी७, आठवीं खुरपिंगला८, नवीं पाटला९ और दसवीं पुच्छपिंगला१०—ये दस प्रकारकी कपिला गौएँ बतलायी गयी हैं, जो सदा मनुष्योंका उद्धार करती हैं ।। मङ्गल्याश्च पवित्राश्च सर्वपापप्रणाशनाः । एवमेव ह्यनड्वाहो दश प्रोक्ता नरेश्वर ॥ ‘नरेश्वर! वे मंगलमयी, पवित्र और सब पापोंको नष्ट करनेवाली हैं। गाड़ी खींचनेवाले बैलोंके भी ऐसे ही दस भेद बताये गये हैं ।। ब्राह्मणो वाहयेत् तांस्तु नान्यो वर्णः कथंचन । न वाहयेच्च कपिलां क्षेत्रे वाध्वनि वा द्विजः ॥ ‘उन बैलोंको ब्राह्मण ही अपनी सवारीमें जोते। दूसरे वर्णका मनुष्य उनसे सवारीका काम किसी प्रकार भी न ले। ब्राह्मण भी कपिला गौको खेतमें या रास्तेमें न जोते ।। वाहयेद् हुङ्कृतेनैव शाखया वा सपत्नया । न दण्डेन न वा यष्ट्या न पाशेन न वा पुनः ॥ ‘गाड़ीमें जुते रहनेपर उन बैलोंको हुंकारकी आवाज देकर अथवा पत्तेवाली टहनीसे हाँके। डंडेसे, छड़ीसे और रस्सीसे मारकर न हाँके ।। न क्षुत्तृष्णाश्रमश्रान्तान् वाहयेद् विकलेन्द्रियान् । अतृप्तेषु न भुञ्जीयात् पिबेत् पीतेषु चोदकम् ॥ ‘जब बैल भूख-प्यास और परिश्रमसे थके हुए हों तथा उनकी इन्द्रियाँ घबरायी हुई हों, तब उन्हें गाड़ीमें न जोते। जबतक बैलोंको खिलाकर तृप्त न कर ले तबतक स्वयं भी भोजन न करे। उन्हें पानी पिलाकर ही स्वयं जलपान करे ।। शुश्रूषोर्मातरश्चैताः पितरस्ते प्रकीर्तिताः । अहं पूर्वत्र भागे च धुर्याणां वाहनं स्मृतम् ॥ ‘सेवा करनेवाले पुरुषकी कपिला गौएँ माता और बैल पिता हैं। दिनके पहले भागमें ही भार ढोनेवाले बैलोंको सवारीमें जोतना उचित माना गया है ।। ’ विश्रामेन्मध्यमे भागे भागे चान्ते यथासुखम् । यत्र च त्वरया कृत्यं संशयो यत्र वाध्वनि । वाहयेत् तत्र धुर्यांस्तु न स पापेन लिप्यते ॥
'दिनके मध्य भागमें—दुपहरीके समय उन्हें विश्राम देना चाहिये; किंतु दिनके अन्तिम भागमें अपनी रुचिके अनुसार बर्ताव करना चाहिये अर्थात् आवश्यकता हो तो उनसे काम ले और न हो तो न ले। जहाँ जल्दीका काम हो अथवा जहाँ मार्गमें किसी प्रकारका भय आनेवाला हो, वहाँ विश्रामके समय भी यदि बैलोंको सवारीमें जोते तो पाप नहीं लगता ।।
भ्रूणहत्यासमं पापं तस्य स्यात् पाण्डुनन्दन । अन्यथा वाहयन् राजन् निरयं याति रौरवम् ।। 'पाण्डुनन्दन! परंतु जो विशेष आवश्यकता न होनेपर भी ऐसे समयमें बैलोंको गाड़ीमें जोतता है, उसे भ्रूण-हत्याके समान पाप लगता है और वह रौरव नरकमें पड़ता है ।।
रुधिरं पातयेत् तेषां यस्तु मोहान्नराधिप । तेन पापेन पापात्मा नरकं यात्यसंशयम् ।। 'नराधिप! जो मोहवश बैलोंके शरीरसे रक्त निकाल देता है, वह पापात्मा उस पापके प्रभावसे निःसंदेह नरकमें गिरता है ।।
नरकेषु च सर्वेषु समाः स्थित्वा शतं शतम् । इह मानुष्यके लोके बलीवर्दो भविष्यति ।। 'वह सभी नरकोंमें सौ-सौ वर्ष रहकर इस मनुष्यलोकमें बैलका जन्म पाता है ।।
तस्मात् तु मुक्तिमन्विच्छन् दद्यात् तु कपिलां नरः ।। 'अतः जो मनुष्य संसारसे मुक्त होना चाहता हो, उसे कपिला गौका दान करना चाहिये ।।
कपिला सर्वयज्ञेषु दक्षिणार्थं विधीयते । तस्मात् तद्दक्षिणा देया यज्ञेष्वेव द्विजातिभिः ।। 'सब प्रकारके यज्ञोंमें दक्षिणा देनेके लिये कपिला गौकी सृष्टि हुई है, इसलिये द्विजातियोंको यज्ञमें उनकी दक्षिणा अवश्य देनी चाहिये ।।
होमार्थं चाग्निहोत्रस्य यां प्रयच्छेत् प्रयत्नतः । श्रोत्रियाय दरिद्राय श्रान्तायामिततेजसे । तेन दानेन पूतात्मा मम लोके महीयते ।। 'जो मनुष्य अग्निहोत्रके होमके लिये अमिततेजस्वी एवं धनहीन श्रोत्रिय ब्राह्मणको प्रयत्नपूर्वक कपिला गौ दानमें देता है, वह उस दानसे शुद्धचित्त होकर मेरे परमधाममें प्रतिष्ठित होता है ।।
सुवर्णखुरशृङ्गीं च कपिलां यः प्रयच्छति । विषुवे चायने चापि सोऽश्वमेधफलं लभेत् । तेनाश्वमेधतुल्येन मम लोकं स गच्छति ।। 'जो मनुष्य कपिलाके सींग और खुरोंमें सोना मढ़ाकर उसे विषुवयोगमें अथवा उत्तरायण-दक्षिणायनके आरम्भमें दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है तथा
उस पुण्यके प्रभावसे वह मेरे लोकमें जाता है ।। अग्निष्टोमसहस्रस्य वाजपेयं च तत्समम् । वाजपेयसहस्रस्य अश्वमेधं च तत्समम् । अश्वमेधसहस्रस्य राजसूयं च तत्समम् ।। ‘एक हजार अग्निष्टोमके समान एक वाजपेय-यज्ञ होता है। एक हजार वाजपेयके समान एक अश्वमेध होता है और एक हजार अश्वमेधके समान एक राजसूय-यज्ञ होता है ।। कपिलानां सहस्रेण विधिदत्तेन पाण्डव । राजसूयफलं प्राप्य मम लोके महीयते । न तस्य पुनरावृत्तिर्विद्यते कुरुपुङ्गव ।। ‘कुरुश्रेष्ठ पाण्डव! जो मनुष्य शास्त्रोक्त विधिसे एक हजार कपिला गौओंका दान करता है, वह राजसूय-यज्ञका फल पाकर मेरे परमधाममें प्रतिष्ठित होता है; उसे पुनः इस लोकमें नहीं लौटना पड़ता ।। तैस्तैर्गुणैः कामदुधा च भूत्वा नरं प्रदातारमुपैति सा गौः । स्वकर्मभिश्चाप्यनुबध्यमानं तीव्रान्धकारे नरके पतन्तम् । महार्णवे नौरिव वायुनीता दत्ता हि गौस्तारयते मनुष्यम् ।। ‘दानमें दी हुई गौ अपने विभिन्न गुणोंद्वारा कामधेनु बनकर परलोकमें दाताके पास पहुँचती है। वह अपने कर्मोंसे बँधकर घोर अन्धकारपूर्ण नरकमें गिरते हुए मनुष्यका उसी प्रकार उद्धार कर देती है, जैसे वायुके सहारेसे चलती हुई नाव मनुष्यको महासागरमें डूबनेसे बचाती है ।। यथौषधं मन्त्रकृतं नरस्य प्रयुक्तमात्रं विनिहन्ति रोगान् । तथैव दत्ता कपिला सुपात्रे पापं नरस्याशु निहन्ति सर्वम् ।। ‘जैसे मन्त्रके साथ दी हुई ओषधि प्रयोग करते ही मनुष्यके रोगोंका नाश कर देती है, उसी प्रकार सुपात्रको दी हुई कपिला गौ मनुष्यके सब पापोंको तत्काल नष्ट कर डालती है ।। यथा त्वचं वै भुजगो विहाय पुनर्नवं रूपमुपैति पुण्यम् । तथैव मुक्तः पुरुषः स्वपापै- र्विरज्यते वै कपिलाप्रदानात् ।।
‘जैसे साँप केंचुल छोड़कर नये स्वरूपको धारण करता है, वैसे ही पुरुष कपिला गौके दानसे पाप-मुक्त होकर अत्यन्त शोभाको प्राप्त होता है ।। यथान्धकारं भवने विलग्नं दीप्तो हि निर्यातयति प्रदीपः । तथा नरः पापमपि प्रलीनं निष्क्रामयेद् वै कपिलाप्रदानात् ।। ‘जैसे प्रज्वलित दीपक घरमें फैले हुए अन्धकारको दूर कर देता है, उसी प्रकार मनुष्य कपिला गौका दान करके अपने भीतर छिपे हुए पापको भी निकाल देता है ।। यस्याहिताग्नेरतिथिप्रियस्य शूद्रान्नदूरस्य जितेन्द्रियस्य । सत्यव्रतस्याध्ययनान्वितस्य दत्ता हि गौस्तारयते परत्र ।। ‘जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेवाला, अतिथिका प्रेमी, शूद्रके अन्नसे दूर रहनेवाला, जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा स्वाध्यायपरायण हो, उसे दी हुई गौ परलोकमें दाताका अवश्य उद्धार करती है' ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
१. सुवर्णके समान पीले रंगवाली। २. गौर तथा पीले रंगवाली। ३. कुछ लालिमा लिये हुए पीले नेत्रोंवाली। ४. जिसके गरदनके बाल कुछ पीले हों। ५. जिसका सारा शरीर पीले रंगका हो। ६. कुछ सफेदी लिये हुए पीले रोमवाली। ७. सुर्ख और पीली आँखोंवाली। ८. जिसके खुर पीले रंगके हों। ९. जिसका हलका लाल रंग हो। १०. जिसकी पूँछके बाल पीले रंगके हों।
[कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन]
[कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन]
वैशम्पायन उवाच
एवं श्रुत्वा परं पुण्यं कपिलादानमुत्तमम् ।
धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार परम पुण्यमय कपिला गौके उत्तम दानका वर्णन सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरका मन बहुत प्रसन्न हुआ और उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया— ।।
देवदेवेश कपिला यदा विप्राय दीयते ।
कथं सर्वेषु चाङ्गेषु तस्यास्तिष्ठन्ति देवताः ॥
‘देवदेवेश्वर! जो कपिला गौ ब्राह्मणको दानमें दी जाती है, उसके सम्पूर्ण अंगोंमें देवता किस प्रकार रहते हैं? ।।
याश्चैताः कपिलाः प्रोक्ता दश चैव त्वया मम ।
तासां कति सुरश्रेष्ठ कपिलाः पुण्यलक्षणाः ॥
‘सुरश्रेष्ठ! आपने जो दस प्रकारकी कपिला गौएँ बतलायी हैं, उनमेंसे कितनी कपिलाएँ पुण्यमयी मानी जाती हैं’? ।।
युधिष्ठिरेणैवमुक्तः केशवः सत्यवाक् तदा ।
गुह्यानां परमं गुह्यं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥
शृणु राजन् पवित्रं वै रहस्यं धर्ममुत्तमम् ॥
युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर उस समय सत्यवादी भगवान् श्रीकृष्ण गोपनीयसे भी अत्यन्त गोपनीय कथा कहने लगे—‘राजन्! मैं परम पवित्र, गोपनीय एवं उत्तम धर्मका वर्णन करता हूँ, सुनो ।।
इदं पठति यः पुण्यं कपिलादानमुत्तमम् ।
प्रातरुत्थाय मद्भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
‘जो मनुष्य सबेरे उठकर मुझमें भक्ति रखते हुए इस परम पुण्यमय उत्तम कपिला-दानके माहात्म्यका पाठ करता है, उसके पुण्यका फल सुनो ।।
मनसा कर्मणा वाचा मतिपूर्वं युधिष्ठिर ।
पापं रात्रिकृतं हन्यादस्याध्यायस्य पाठकः ॥
‘युधिष्ठिर! इस अध्यायका पाठ करनेवाला मनुष्य रात्रिमें मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा जान-बूझकर किये हुए सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।।
इदमावर्तमानस्तु श्राद्धे यस्तर्पयेद् द्विजान् ।
तस्याप्यमृतमश्नन्ति पितरोऽत्यन्तहर्षिताः ॥
‘जो श्राद्धकालमें इस अध्यायका पाठ करते हुए ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे तृप्त करता है, उसके पितर अत्यन्त प्रसन्न होकर अमृत भोजन करते हैं ।।
यश्चेदं शृणुयाद् भक्त्या मद्गतेनान्तरात्मना ।
तस्य रात्रिकृतं सर्वं पापमाशु प्रणश्यति ।।
‘जो मुझमें चित्त लगाकर इस प्रसंगको भक्तिपूर्वक सुनता है, उसके एक रातके सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं ।।
अतः परं विशेषं तु कपिलानां ब्रवीमि ते ।
यश्चैताः कपिलाः प्रोक्ता दश राजन् मया तव ।
तासां चतस्रः प्रवराः पुण्याः पापविनाशनाः ।।
‘अब मैं कपिला गौके सम्बन्धमें विशेष बातें बतला रहा हूँ। राजन्! पहले जो मैंने तुम्हें दस प्रकारकी कपिला गौएँ बतलायी हैं, उनमें चार कपिलाएँ अत्यन्त श्रेष्ठ, पुण्य प्रदान करनेवाली तथा पाप नष्ट करनेवाली हैं ।।
सुवर्णकपिला पुण्यास्तथा रक्ताक्षपिङ्गला ।
पिङ्गलाक्षी च या गौश्च स्यात् पिङ्गलपिङ्गला ।।
एताश्चतस्रः प्रवराः पवित्राः पापनाशनाः ।
नमस्कृता वा दृष्टा वा घ्नन्ति पापं नरस्य तु ।।
‘सुवर्णकपिला, रक्ताक्षपिंगला, पिंगलाक्षी और पिंगलपिंगला—ये चार प्रकारकी कपिलाएँ श्रेष्ठ, पवित्र और पाप दूर करनेवाली हैं। इनके दर्शन और नमस्कारसे भी मनुष्यके पाप नष्ट हो जाते हैं ।।
यस्यैताः कपिलाः सन्ति गृहे पापप्रणाशनाः ।
तत्र श्रीर्विजयः कीर्तिः स्फीता नित्यं युधिष्ठिर ।।
‘युधिष्ठिर! ये पापनाशिनी कपिला गौएँ जिसके घरमें मौजूद रहती हैं वहाँ श्री, विजय और विशाल कीर्तिका नित्य निवास होता है ।।
एतासां प्रीतिमायाति क्षीरेण तु वृषध्वजः ।
दध्ना च त्रिदशाः सर्वे घृतेन तु हुताशनः ।।
‘इनके दूधसे भगवान् शंकर, दहीसे सम्पूर्ण देवता और घीसे अग्निदेव तृप्त होते हैं ।।
कपिलाया घृतं क्षीरं दधि पायसमेव वा ।
श्रोत्रियेभ्यः सकृद् दत्त्वा नरः पापैः प्रमुच्यते ।।
‘कपिला गौके घी, दूध, दही अथवा खीरका एक बार भी श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको दान करके मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ।।
उपवासं तु यः कृत्वाप्यहोरात्रं जितेन्द्रियः ।
कपिलापञ्चगव्यं तु पीत्वा चान्द्रायणात् परम् ।।
'जो जितेन्द्रिय रहकर एक दिन-रात उपवास करके कपिला गौका पञ्चगव्य पान करता है, उसे चान्द्रायणसे बढ़कर उत्तम फलकी प्राप्ति होती है॥ सौम्ये मुहूर्ते तत् प्राश्य शुद्धात्मा शुद्धमानसः। क्रोधानृतविनिर्मुक्तो मद्गतेनान्तरात्मना॥ 'जो क्रोध और असत्यका त्याग करके मुझमें चित्त लगाकर शुभ मुहूर्तमें कपिला गौके पंचगव्यका आचमन करता है, उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है॥ कपिलापञ्चगव्येन समन्त्रेण पृथक् पृथक्। यो मत्प्रतिकृतिं वापि शङ्कराकृतिमेव वा। स्नापयेद् विषुवे यस्तु सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ 'जो विषुवयोगमें पृथक्-पृथक् मन्त्र पढ़कर कपिलाके पञ्चगव्यसे मेरी या शंकरकी प्रतिमाको स्नान कराता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है॥ स मुक्तपापः शुद्धात्मा यानेनाम्बरशोभिना। मम लोकं व्रजेन्मुक्तो रुद्रलोकमथापि वा॥ 'वह मुक्त, निष्पाप एवं शुद्धचित्त होकर आकाशकी शोभा बढ़ानेवाले विमानके द्वारा मेरे अथवा रुद्रके लोकमें गमन करता है॥ तस्मात् तु कपिला देया परत्र हितमिच्छता॥ यदा च दीयते राजन् कपिला ह्यग्निहोत्रिणे। तदा च शृङ्गयोस्तस्या विष्णुरिन्द्रश्च तिष्ठतः। 'राजन्! इसलिये परलोकमें हित चाहनेवाले पुरुषको कपिला गौका दान अवश्य करना चाहिये। जिस समय अग्निहोत्री ब्राह्मणको कपिला गौ दानमें दी जाती है, उस समय उसके सींगोंके ऊपरी भागमें विष्णु और इन्द्र निवास करते हैं॥ चन्द्रवज्रधरौ चापि तिष्ठतः शृङ्गमूलयोः। शृङ्गमध्ये तथा ब्रह्मा ललाटे गोर्वृषध्वजः॥ 'सींगोंकी जड़में चन्द्रमा और वज्रधारी इन्द्र रहते हैं। सींगोंके बीचमें ब्रह्मा तथा ललाटमें भगवान् शंकरका निवास होता है॥' कर्णयोरश्विनौ देवौ चक्षुषी शशिभास्करौ। दन्तेषु मरुतो देवा जिह्वायां वाक् सरस्वती॥ रोमकूपेषु मुनयश्चर्मण्येव प्रजापतिः। निःश्वासेषु स्थिता वेदाः सषडङ्गपदक्रमाः॥ 'दोनों कानोंमें अश्विनीकुमार, नेत्रोंमें चन्द्रमा और सूर्य, दाँतोंमें मरुद्गण, जिह्वामें सरस्वती, रोमकूपोंमें मुनि, चमड़ेमें प्रजापति एवं श्वासोंमें षडंग, पद और क्रमसहित चारों वेदोंका निवास है॥ नासापुटे स्थिता गन्धाः पुष्पाणि सुरभीणि च।
अधरे वसवः सर्वे मुखे चाग्निः प्रतिष्ठितः ॥ ‘नासिका-छिद्रोंमें गन्ध और सुगन्धित पुष्प, नीचेके ओठमें सब वसुगण तथा मुखमें अग्नि निवास करते हैं ।। साध्या देवाः स्थिताः कक्षे ग्रीवायां पार्वती स्थिता । पृष्ठे च नक्षत्रगणाः ककुद्देशे नभःस्थलम् ॥ अपाने सर्वतीर्थानि गोमूत्रे जाह्नवी स्वयम् । अष्टैश्वर्यमयी लक्ष्मीर्गोमये वसते सदा ।। ‘कक्षमें साध्य-देवता, गरदनमें पार्वती, पीठपर नक्षत्रगण, ककुद्के स्थानमें आकाश, अपानमें सारे तीर्थ, मूत्रमें साक्षात् गंगाजी तथा गोबरमें आठ ऐश्वर्योंसे सम्पन्न लक्ष्मीजी रहती हैं ।। नासिकायां सदा देवी ज्येष्ठा वसति भामिनी । श्रोणीतटस्थाः पितरो रमा लाङ्गूलमाश्रिता ॥ ‘नासिकामें परम सुन्दरी ज्येष्ठादेवी, नितम्बोंमें पितर एवं पूँछमें भगवती रमा रहती हैं ।। पार्श्वयोरुभयोः सर्वे विश्वेदेवाः प्रतिष्ठिताः । तिष्ठत्युरसि तासां तु प्रीतः शक्तिधरो गुहः ॥ ‘दोनों पसलियोंमें सब विश्वेदेव स्थित हैं और छातीमें प्रसन्नचित्त शक्तिधारी कार्तिकेय रहते हैं ।। जानुजङ्घोरुदेशेषु पञ्च तिष्ठन्ति वायवः । खुरमध्येषु गन्धर्वाः खुराग्रेषु च पन्नगाः ॥ ‘घुटनों और ऊरुओंमें पाँच वायु रहते हैं, खुरोंके मध्यमें गन्धर्व और खुरोंके अग्रभागमें सर्प निवास करते हैं ।। चत्वारः सागराः पूर्णास्तस्या एव पयोधराः । रतिर्मेधा क्षमा स्वाहा श्रद्धा शान्तिर्धृतिः स्मृतिः । कीर्तिर्दीप्तिः क्रिया कान्तिस्तुष्टिः पुष्टिश्श्व संततिः । दिशश्च प्रदिशश्चैव सेवन्ते कपिलां सदा ॥ ‘जलसे परिपूर्ण चारों समुद्र उसके चारों स्तन हैं। रति, मेधा, क्षमा, स्वाहा, श्रद्धा, शान्ति, धृति, स्मृति, कीर्ति, दीप्ति, क्रिया, कान्ति, तुष्टि, पुष्टि, संतति, दिशा और प्रदिशा आदि देवियाँ सदा कपिला गौका सेवन किया करती हैं ।। देवाः पितृगणाश्चापि गन्धर्वाप्सरसां गणाः । लोका द्वीपार्णवाश्चैव गङ्गाद्याः सरितस्तथा ॥ देवाः पितृगणाश्चापि वेदाः साङ्गाः सहाध्वरैः । वेदोक्तैर्विविधैर्मन्त्रैः स्तुवन्ति हृषितास्तथा ॥
विद्याधराश्च ये सिद्धा भूतास्तारागणास्तथा ।
पुष्पवृष्टिं च वर्षन्ति प्रनृत्यन्ति च हर्षिताः ॥
‘देवता, पितर, गन्धर्व, अप्सराएँ, लोक, द्वीप, समुद्र, गंगा आदि नदियाँ तथा अंगों और यज्ञोंसहित सम्पूर्ण वेद नाना प्रकारके मन्त्रोंसे कपिला गौकी प्रसन्नतापूर्वक स्तुति किया करते हैं। विद्याधर, सिद्ध, भूतगण और तारागण—ये कपिला गौको देखकर फूलोंकी वर्षा करते और हर्षमें भरकर नाचने लगते हैं’ ॥
ब्रह्मणोत्पादिता देवी वह्निकुण्डान्महाप्रभा ।
नमस्ते कपिले पुण्ये सर्वदेवैर्नमस्कृते ॥
कपिलेऽथ महासत्त्वे सर्वतीर्थमये शुभे ।
‘वे कहते हैं—‘सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित पुण्यमयी कपिलादेवी! तुम्हें नमस्कार है। ब्रह्माजीने तुम्हें अग्निकुण्डसे उत्पन्न किया है। तुम्हारी प्रभा विस्तृत और शक्ति महान् है। कपिलादेवी! समस्त तीर्थ तुम्हारे ही स्वरूप हैं और तुम सबका शुभ करनेवाली हो’ ॥
अहो रत्नमिदं पुण्यं सर्वदुःखघ्नमुत्तमम् ।
अहो धर्मार्जितं शुद्धमिदमग्र्यं महाधनम् ॥
इत्याकाशस्थितास्ते तु सर्वदेवा जपन्ति च ॥
‘समस्त देवता आकाशमें खड़े होकर कहा करते हैं—‘अहो! यह कपिला गौरूपी रत्न कितना पवित्र और कितना उत्तम है! यह सब दुःखोंको दूर करनेवाला है। अहा! यह धर्मसे उपार्जित, शुद्ध, श्रेष्ठ और महान् धन है’ ॥
युधिष्ठिर उवाच
देवदेवेश दैत्यघ्न कालः को हव्यकव्ययोः ।
के तत्र पूजामर्हन्ति वर्जनीयाश्च के द्विजाः ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**दैत्योंके विनाशक देवदेवेश्वर! हव्य (यज्ञ) और कव्य (श्राद्ध)-का उत्तम समय कौन-सा है? उसमें किन ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये और किनका परित्याग? ॥
श्रीभगवानुवाच
दैवं पूर्वाह्निकं ज्ञेयं पैतृकं चापराह्निकम् ।
कालहीनं च यद् दानं तद् दानं राजसं विदुः ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**युधिष्ठिर! देवकर्म (यज्ञ) पूर्वाह्नकालमें करने योग्य है और पितृकर्म (श्राद्ध) अपराह्नकालमें—ऐसा समझना चाहिये। जो दान अयोग्य समयमें किया जाता है, उस दानको राजस माना गया है ॥
अवघुष्टं च यद् भुक्तमनृतेन च भारत ।
परामृष्टं शुना वापि तद् भागं राक्षसं विदुः ॥
जिसके लिये लोगोंमें ढिंढोरा पीटा गया हो, जिसमेंसे किसी असत्यवादी मनुष्यने भोजन कर लिया हो तथा जो कुत्तेसे छू गया हो, उस अन्नको राक्षसोंका भाग समझना चाहिये।।
यावन्तः पतिता विप्रा जडोन्मत्तादयोऽपि च।
दैवे च पित्र्ये ते विप्रा राजन् नार्हन्ति सत्क्रियाम्।।
राजन्! जितने पतित, जड और उन्मत्त ब्राह्मण हों, उनका देव-यज्ञ और पितृ-यज्ञमें सत्कार नहीं करना चाहिये।।
क्लीबः प्लीही च कुष्ठी च राजयक्ष्मान्वितश्च यः।
अपस्मारी च यश्चापि पित्र्ये नार्हति सत्कृतिम्।।
नपुंसक, प्लीहा रोगसे ग्रस्त, कोढ़ी और राजयक्ष्मा तथा मृगीका रोगी भी श्राद्धमें आदरके योग्य नहीं माना गया है।।
चिकित्सका देवलका मिथ्यानियमधारिणः।
सोमविक्रयिणश्चापि श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
वैद्य, पुजारी, झूठे नियम धारण करनेवाले (पाखण्डी) तथा सोमरस बेचनेवाले ब्राह्मण श्राद्धमें सत्कार पानेके अधिकारी नहीं हैं।।
गायका नर्तकाश्चैव प्लवका वादकास्तथा।
कथका यौधिकाश्चैव श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
गवैये, नाचने-कूदनेवाले, बाजा बजानेवाले, बकवादी और योद्धा श्राद्धमें सत्कारके योग्य नहीं हैं।।
अनग्नयश्च ये विप्राः शवनिर्यातकाश्च ये।
स्तेनाश्चापि विकर्मस्था राजन् नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
राजन्! अग्निहोत्र न करनेवाले, मुर्दा ढोनेवाले, चोरी करनेवाले और शास्त्रविरुद्ध कर्मसे संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण भी श्राद्धमें सत्कार पानेयोग्य नहीं माने जाते।।
अपरिज्ञातपूर्वाश्च गणपुत्राश्च ये द्विजाः।
पुत्रिकापुत्रकाश्चापि श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
जो अपरिचित हों, जो किसी समुदायके पुत्र हों अर्थात् जिनके पिताका निश्चित पता न हो तथा जो पुत्रिका-धर्मके अनुसार नानाके घरमें रहते हों, वे ब्राह्मण भी श्राद्धके अधिकारी नहीं हैं।।
रणकर्ता च यो विप्रो यश्च वाणिज्यको द्विजः।
प्राणिविक्रयवृत्तिश्च श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
युद्धमें लड़नेवाला, रोजगार करनेवाला तथा पशु-पक्षियोंकी बिक्रीसे जीविका चलानेवाला ब्राह्मण भी श्राद्धमें सत्कार पानेका अधिकारी नहीं है।।
चीर्णव्रतगुणैर्युक्ता नित्यं स्वाध्यायतत्पराः।
सवित्रीज्ञाः क्रियावन्तस्ते श्राद्धे सत्कृतिक्षमाः ॥ परंतु जो ब्राह्मण व्रतका आचरण करनेवाले, गुणवान्, सदा स्वाध्यायपरायण, गायत्रीमन्त्रके ज्ञाता और क्रियानिष्ठ हों, वे श्राद्धमें सत्कारके योग्य माने गये हैं ॥ श्राद्धस्य ब्राह्मणः कालः प्राप्तं दधि घृतं तथा । दर्भाः सुमनसः क्षेत्रं तत्काले श्राद्धदो भवेत् ॥ श्राद्धका सबसे उत्तम काल है सुपात्र ब्राह्मणका मिलना। जिस समय भी ब्राह्मण, दही, घी, कुशा, फूल और उत्तम क्षेत्र प्राप्त हो जायँ, उसी समय श्राद्धका दान आस्मभ कर देना चाहिये ॥ चारित्रनिरता राजन् कृशा ये कृशवृत्तयः । तपस्विनश्च ये विप्रास्तथा भैक्षचराश्च ये ॥ अर्थिनः केचिदिच्छन्ति तेषां दत्तं महत् फलम् । राजन्! जो ब्राह्मण सदाचारी, थोड़ी-सी आजीविका-पर गुजारा करनेवाले, दुर्बल, तपस्वी और भिक्षासे निर्वाह करनेवाले हों, वे यदि याचक होकर कुछ माँगने आवें तो उन्हें दिये हुए दानका महान् फल होता है ॥ एवं धर्मभृतां श्रेष्ठ ज्ञात्वा सर्वात्मना तदा । श्रोत्रियाय दरिद्राय प्रयच्छानुपकारिणे ॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! इन सब बातोंको पूर्णरूपसे जानकर धनहीन और अपना उपकार न करनेवाले वेदवेत्ता ब्राह्मणको दान करो ॥ दानं यत् ते प्रियं किंचिच्छ्रोत्रियाणां च यत् प्रियम् । तत् प्रयच्छस्व धर्मज्ञ यदिच्छसि तदक्षयम् ॥ धर्मज्ञ! यदि तुम अपने दानको अक्षय बनाना चाहते हो तो जो दान तुम्हें प्रिय लगता हो तथा जिसे वेदवेत्ता ब्राह्मण पसंद करते हों, वही दान करो ॥ निरयं ये च गच्छन्ति तच्छृणुष्व युधिष्ठिर ॥ युधिष्ठिर! अब नरकमें जानेवाले पुरुषोंका वर्णन सुनो ॥ परदारापहर्तारः परदाराभिमर्शकाः । परदारप्रयोक्तारस्ते वै निरयगामिनः ॥ जो परायी स्त्रीका अपहरण करते हैं, परस्त्रीके साथ व्यभिचार करते हैं और दूसरोंकी स्त्रियोंको दूसरे पुरुषोंसे मिलाया करते हैं, वे भी नरकमें पड़ते हैं ॥ सूचकाः संधिभेत्तारः परद्रव्योपजीविनः । वर्णाश्रमाणां ये बाह्याः पाखण्डाश्चैव पापिनः । उपासते च तानेव ते सर्वे नरकालयाः ॥ चुगलखोर, सुलहकी शर्त तोड़नेवाले, पराये धनसे जीविका चलानेवाले, वर्ण और आश्रमसे विरुद्ध आचरण करनेवाले, पाखण्डी, पापाचारी तथा जो उनकी सेवा करते हैं, वे
सब नरकगामी होते हैं ।। क्षान्तान् दान्तान् कृशान् प्राज्ञान् दीर्घकालं सहोषितान् । त्यजन्ति कृतकृत्या ये ते वै निरयगामिनः ॥ जो मनुष्य चिरकालतक अपने साथ रहे हुए सहनशील, जितेन्द्रिय, दुर्बल और बुद्धिमान् मनुष्योंको भी काम निकल जानेपर त्याग देते हैं, वे नरकगामी होते हैं ।। बालानामपि वृद्धानां श्रान्तानां चापि ये नराः । अदत्त्वाश्नन्ति मृष्टान्नं ते वै निरयगामिनः ॥ जो बच्चों, बूढ़ों तथा थके हुए मनुष्योंको कुछ न देकर अकेले ही मिठाई खाते हैं, उन्हें भी नरकमें गिरना पड़ता है ।। एते पूर्वर्षिभिः प्रोक्ता नरा निरयगामिनः । ये स्वर्गं समनुप्राप्तास्तान् शृणुष्व युधिष्ठिर ॥ प्राचीन कालके ऋषियोंने इस प्रकार नरकगामी मनुष्योंका वर्णन किया है। युधिष्ठिर! अब स्वर्गमें जानेवालोंका वर्णन सुनो ।। दानेन तपसा चैव सत्येन च दमेन च । ये धर्ममनुवर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ जो दान, तपस्या, सत्य-भाषण और इन्द्रियसंयमके द्वारा निरन्तर धर्माचरणमें लगे रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। शुश्रूषयाप्युपाध्यायाच्छ्रुतमादाय पाण्डव । ये प्रतिग्रहनिस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ पाण्डुनन्दन! जो उपाध्यायकी सेवा करके उनसे वेद पढ़ते तथा प्रतिग्रहमें आसक्ति नहीं रखते, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। मधुमांसासवेभ्यस्तु निवृत्ता व्रतिनस्तु ये । परदारनिवृत्ता ये ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ जो मधु, मांस, आसव (मदिरा)-से निवृत्त होकर उत्तम व्रतका पालन करते हैं और परस्त्रीके संसर्गसे बचे रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गको जाते हैं ।। मातरं पितरं चैव शुश्रूषन्ति च ये नराः । भ्रातृणामपि सस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ जो मनुष्य माता-पिताकी सेवा करते हैं तथा भाइयोंके प्रति स्नेह रखते हैं, वे मनुष्य स्वर्गको जाते हैं ।। ये तु भोजनकाले तु निर्याताश्चातिथिप्रियाः । द्वाररोधं न कुर्वन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ जो भोजनके समय घरसे बाहर निकलकर अतिथि-सेवा करते हैं, अतिथियोंसे प्रेम रखते हैं और उनके लिये कभी अपना दरवाजा बंद नहीं करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते