महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसब नरकगामी होते हैं ।। क्षान्तान् दान्तान् कृशान् प्राज्ञान् दीर्घकालं सहोषितान् । त्यजन्ति कृतकृत्या ये ते वै निरयगामिनः ॥ जो मनुष्य चिरकालतक अपने साथ रहे हुए सहनशील, जितेन्द्रिय, दुर्बल और बुद्धिमान् मनुष्योंको भी काम निकल जानेपर त्याग देते हैं, वे नरकगामी होते हैं ।। बालानामपि वृद्धानां श्रान्तानां चापि ये नराः । अदत्त्वाश्नन्ति मृष्टान्नं ते वै निरयगामिनः ॥ जो बच्चों, बूढ़ों तथा थके हुए मनुष्योंको कुछ न देकर अकेले ही मिठाई खाते हैं, उन्हें भी नरकमें गिरना पड़ता है ।। एते पूर्वर्षिभिः प्रोक्ता नरा निरयगामिनः । ये स्वर्गं समनुप्राप्तास्तान् शृणुष्व युधिष्ठिर ॥ प्राचीन कालके ऋषियोंने इस प्रकार नरकगामी मनुष्योंका वर्णन किया है। युधिष्ठिर! अब स्वर्गमें जानेवालोंका वर्णन सुनो ।। दानेन तपसा चैव सत्येन च दमेन च । ये धर्ममनुवर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ जो दान, तपस्या, सत्य-भाषण और इन्द्रियसंयमके द्वारा निरन्तर धर्माचरणमें लगे रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। शुश्रूषयाप्युपाध्यायाच्छ्रुतमादाय पाण्डव । ये प्रतिग्रहनिस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ पाण्डुनन्दन! जो उपाध्यायकी सेवा करके उनसे वेद पढ़ते तथा प्रतिग्रहमें आसक्ति नहीं रखते, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। मधुमांसासवेभ्यस्तु निवृत्ता व्रतिनस्तु ये । परदारनिवृत्ता ये ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ जो मधु, मांस, आसव (मदिरा)-से निवृत्त होकर उत्तम व्रतका पालन करते हैं और परस्त्रीके संसर्गसे बचे रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गको जाते हैं ।। मातरं पितरं चैव शुश्रूषन्ति च ये नराः । भ्रातृणामपि सस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ जो मनुष्य माता-पिताकी सेवा करते हैं तथा भाइयोंके प्रति स्नेह रखते हैं, वे मनुष्य स्वर्गको जाते हैं ।। ये तु भोजनकाले तु निर्याताश्चातिथिप्रियाः । द्वाररोधं न कुर्वन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ जो भोजनके समय घरसे बाहर निकलकर अतिथि-सेवा करते हैं, अतिथियोंसे प्रेम रखते हैं और उनके लिये कभी अपना दरवाजा बंद नहीं करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते