भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2172, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2172

हैं ।। वैवाहिकं तु कन्यानां दरिद्राणां च ये नराः ।
कारयन्ति च कुर्वन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो दरिद्र मनुष्योंकी कन्याओंका धनियोंसे ब्याह करा देते हैं अथवा स्वयं धनी होते हुए भी दरिद्रकी कन्यासे ब्याह करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।।
रसानामथ बीजानामोषधीनां तथैव च ।
दातारः श्रद्धयोपेतास्ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो श्रद्धापूर्वक रस, बीज और ओषधियोंका दान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
क्षेमाक्षेमं च मार्गेषु समानि विषमाणि च ।
अर्थिनां ये च वक्ष्यन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो मार्गमें जिज्ञासा करनेवाले पथिकोंको अच्छे-बुरे, सुखदायक और दुःखदायक मार्गका ठीक-ठीक परिचय दे देते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
पर्वद्वये चतुर्दश्यामष्टम्यां संध्ययोर्द्वयोः ।
आर्द्रायां जन्मनक्षत्रे विषुवे श्रवणेऽथवा ।
ये ग्राम्यधर्मविरतास्ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो अमावस्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी, अष्टमी—इन तिथियोंमें दोनों संध्याओंके समय, आर्द्रा नक्षत्रमें, जन्म-नक्षत्रमें, विषुव योगमें और श्रवण नक्षत्रमें स्त्रीसमागमसे बचे रहते हैं, वे मनुष्य भी स्वर्गमें जाते हैं ।।
हव्यकव्यविधानं च नरकस्वर्गगामिनौ ।
धर्माधर्मौ च कथितौ किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।।
राजन्! इस प्रकार हव्य-कव्यके विधानका समय बताया गया और स्वर्ग तथा नरकमें ले जानेवाले धर्म-अधर्मोंका वर्णन किया गया। अब और क्या सुनना चाहते हो ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)