महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2173, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें[ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन]
युधिष्ठिर उवाच
इदं मे तत्त्वतो देव वक्तुमर्हस्यशेषतः ।
हिंसामकृत्वा यो मर्त्यो ब्रह्महत्यामवाप्नुयात् ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! मनुष्य ब्राह्मणकी हिंसा किये बिना ही ब्रह्महत्याके पापसे कैसे लिप्त हो जाता है, इस विषयको पूर्णतया ठीक-ठीक बतानेकी कृपा कीजिये ।।
श्रीभगवानुवाच
ब्राह्मणं स्वयमाहूय भिक्षार्थं वृत्तिकर्शितम् ।
ब्रूयान्नास्तीति यः पश्चात् तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! जो जीविकारहित ब्राह्मणको स्वयं ही भिक्षा देनेके लिये बुलाकर पीछे इनकार कर जाता है, उसे ब्रह्महत्यारा कहते हैं ।।
मध्यस्थस्येह विप्रस्य योऽनूचानस्य भारत ।
वृत्तिं हरति दुर्बुद्धिस्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
भरतनन्दन! जो दुष्ट बुद्धिवाला पुरुष मध्यस्थ और ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणकी जीविका छीन लेता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।
आश्रमे वाऽऽलये वापि ग्रामे वा नगरेऽपि वा ।
अग्निं यः प्रक्षिपेत् क्रुद्धस्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
जो क्रोधमें भरकर किसी आश्रम, घर, गाँव अथवा नगरमें आग लगा देता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।
गोकुलस्य तृषार्तस्य जलान्ते वसुधाधिप ।
उत्पादयति यो विघ्नं तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
पृथ्वीनाथ! प्याससे तड़पते हुए गोसमुदायको जो पानीके निकट पहुँचनेमें बाधा डालता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।
यः प्रवृत्तां श्रुतिं सम्यक् शास्त्रं वा मुनिभिः कृतम् ।
दूषयत्यनभिज्ञाय तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
जो परम्परागत वैदिक श्रुतियों और ऋषिप्रणीत सच्छास्त्रोंपर बिना समझे-बूझे दोषारोपण करता है, उसे भी ब्रह्महत्यारा कहते हैं ।।
चक्षुषा वापि हीनस्य पङ्गोर्वापि जडस्य वा ।
हरेद् वै यस्तु सर्वस्वं तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
जो अन्धे, पंगु और गूँगे मनुष्यका सर्वस्व हरण कर लेता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।