महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2174, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुरुं त्वंकृत्य हुंकृत्य अतिक्रम्य च शासनम्।
वर्तते यस्तु मूढात्मा तमाहुर्ब्रह्मघातकम्॥
जो मूर्खतावश गुरुको ‘तू’ कहकर पुकारता है, हुंकारके द्वारा उनका तिरस्कार करता है तथा उनकी आज्ञाका उल्लंघन करके मनमाना बर्ताव करता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं॥
यावत्सारो भवेद् दीनस्तन्नाशे यस्य दुःस्थितिः।
तत् सर्वस्वं हरेद् यो वै तमाहुर्ब्रह्मघातकम्॥
जो दीन मनुष्य किंचित् प्राप्त वस्तुओंको ही अपने लिये सार-सर्वस्व समझता है और उनके नाशसे जिसकी दुर्दशा हो जाती है, ऐसे मनुष्यका जो पुरुष सर्वस्व छीन लेता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं॥
युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषामपि दानानां यत् तु दानं विशिष्यते।
अभोज्यान्नांश्च ये विप्रास्तान् वदस्व सुरोत्तम॥
युधिष्ठिरने पूछा—भगवान्! जो दान सब दानोंसे श्रेष्ठ माना गया हो, उसको बतलाइये। सुरश्रेष्ठ! जिन ब्राह्मणोंका अन्न खाने योग्य न हो, उनका परिचय दीजिये॥
श्रीभगवानुवाच
अन्नमेव प्रशंसन्ति देवा ब्रह्मपुरस्सराः।
अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति॥
श्रीभगवान्ने कहा—राजन्! ब्रह्मा आदि सभी देवता अन्नकी प्रशंसा करते हैं, अतः अन्नके समान दान न कोई हुआ है न होगा॥
अन्नमूर्जस्करं लोके ह्यन्नात् प्राणाः प्रतिष्ठिताः।
अभोज्यान्नान् मया राजन् वक्ष्यमाणान् निबोध मे॥
क्योंकि अन्न ही इस जगत्में बल देनेवाला है तथा अन्नके ही आधारपर प्राण टिके रहते हैं। राजन्! अब मैं उन लोगोंका परिचय दे रहा हूँ, जिनका अन्न ग्रहण करने योग्य नहीं माना गया है, ध्यान देकर सुनो॥
दीक्षितस्य कदर्यस्य क्रुद्धस्य निकृतस्य च।
अभिशप्तस्य षाण्ढस्य पाकभेदकरस्य च॥
चिकित्सकस्य दूतस्य तथा चोच्छिष्टभोजिनः।
उग्रान्नं सूतकान्नं च शूद्रोच्छेषणमेव च॥
द्विषदन्नं न भोक्तव्यं पतितान्नं च यच्छ्रुतम्।
यज्ञमें दीक्षित, कदर्य, क्रोधी, शठ, शापग्रस्त, नपुंसक, भोजनमें भेद करनेवाले, चिकित्सक, दूत, उच्छिष्टभोजी, वर्णसंकर तथा अशौचमें पड़े हुए मनुष्यका अन्न, शूद्रकी