महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2175, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजूठन, शत्रु का अन्न और जो पतितका अन्न माना गया है, उसे भी नहीं खाना चाहिये ।।
तथा च पिशुनस्यान्नं यज्ञविक्रयिणस्तथा ।।
शैलूषं तन्तुवायान्नं कृतघ्नस्यान्नमेव च ।
अम्बष्ठकनिषादानां रङ्गावतरकस्य च ।।
सुवर्णकर्तुर्वैणस्य शस्त्रविक्रयिणस्तथा ।
सूतानां शौण्डिकानां च वैद्यस्य रजकस्य च ।।
स्त्रीजितस्य नृशंसस्य तथा माहिषिकस्य च ।
अनिर्दशानां प्रेतानां गणिकानां तथैव च ।।
इसी प्रकार चुगलखोर, यज्ञका फल बेचनेवाले, नट और कपड़ा बुननेवाले जुलाहेका अन्न एवं कृतघ्नका अन्न, अम्बष्ठ, निषाद, रंगभूमिमें नाटक खेलनेवाले, सुनार, वीणा बजाकर जीनेवाले, हथियार बेचनेवाले, सूत, शराब बेचनेवाले, वैद्य, धोबी, स्त्रीके वशमें रहनेवाले, क्रूर और भैंस चरानेवालेका अन्न भी अग्राह्य माना गया है। जिनके यहाँ मरणाशौचके दस दिन न बीते हों, उनका तथा वेश्याओंका अन्न नहीं खाना चाहिये ।।
राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम् ।
आयुः सुवर्णकारान्नं यशश्चर्मविक्रन्तिनः ।।
राजाका अन्न तेजका, शूद्रका अन्न ब्राह्मणत्वका, सुनारका अन्न आयुका और चमारका अन्न सुयशका नाश करता है ।।
गणान्नं गणिकान्नं च लोकेभ्यः परिकीर्तितम् ।
पूयं चिकित्सकस्यान्नं शुक्लं तु वृषलीपतेः ।।
विष्टा वार्धुषिक्स्यान्नं तस्मात् तत् परिवर्जयेत् ।
किसी समूहका और वेश्याका अन्न भी लोकनिन्दित माना गया है। वैद्यका अन्न पीब तथा व्यभिचारिणीके पतिका अन्न वीर्यके समान एवं व्याजखोरका अन्न विष्ठाके समान माना गया है, इसलिये उसका त्याग कर देना चाहिये ।।
अमत्यान्नमथैतेषां भुक्त्वा तु त्र्यहं क्षियेत् ।
मत्या भुक्त्वा सकृद् वापि प्राजापत्यं चरेद् द्विजः ।।
यदि अनजानमें इनका अन्न ग्रहण कर लिया गया हो तो तीन दिनतक उपवास करना चाहिये; किंतु जान-बूझकर एक बार भी इनका अन्न खा लेनेपर ब्राह्मणको प्राजापत्यव्रतका आचरण करना चाहिये ।।
दानानां च फलं यद् वै शृणु पाण्डव तत्त्वतः ।
जलदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षय्यमन्नदः ।।
पाण्डुनन्दन! अब मैं दानोंका यथार्थ फल बतला रहा हूँ, सुनो। जल-दान करनेवालेको तृप्ति होती है और अन्न देनेवालेको अक्षय सुख मिलता है ।।
तिलदश्च प्रजामिष्टां दीपश्चक्षुरुत्तमम् ।