महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2176, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिदो भूमिमाप्नोति दीर्घमायुर्हिरण्यदः ॥ तिलका दान करनेवाला मनुष्य मनके अनुरूप संतान, दीप-दान करनेवाला पुरुष उत्तम नेत्र, भूमि देनेवाला भूमि और सुवर्ण-दान करनेवाला दीर्घ आयु पाता है ।।
गृहदोऽग्र्याणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम् । वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्विसालोक्यमश्वदः ॥ गृह देनेवालेको सुन्दर भवन और चाँदी दान करनेवालेको उत्तम रूपकी प्राप्ति होती है। वस्त्र देनेवाला चन्द्रलोकमें और अश्वदान करनेवाला अश्विनीकुमारोंके लोकमें जाता है ।।
अनडुहः श्रियं जुष्टां गोदो गोलोकमश्रुते । यानशय्याप्रदो भार्यामैश्वर्यमभयप्रदः ॥ गाड़ी ढोनेवाले बैलका दान करनेवाला मनोऽनुकूल लक्ष्मीको पाता है और गो-दान करनेवाला पुरुष गोलोकके सुखका अनुभव करता है। सवारी और शय्या-दान करनेवाले पुरुषको स्त्रीकी तथा अभय दान देनेवालेको ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है ।।
धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्मसाम्यताम् । सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते ॥ धान्य दान करनेवाला मनुष्य शाश्वत सुख पाता है और वेद प्रदान करनेवाला पुरुष परब्रह्मकी समताको प्राप्त होता है। वेदका दान सब दानोंमें श्रेष्ठ है ।।
हिरण्यभूगवाश्वाजवस्त्रशय्यासनादिषु । योऽर्चितः प्रतिगृह्णाति दद्यादुचितमेव च । तावुभौ गच्छतः स्वर्गं नरकं च विपर्यये ॥ जो सोना, पृथ्वी, गौ, अश्व, बकरा, वस्त्र, शय्या और आसन आदि वस्तुओंको सम्मानपूर्वक ग्रहण करता है तथा जो दाता न्यायानुसार आदरपूर्वक दान करता है, वे दोनों ही स्वर्गमें जाते हैं; परंतु जो इसके विपरीत अनुचितरूपसे देते और लेते हैं, उन दोनोंको नरकमें गिरना पड़ता है ।।
अनृतं न वदेद् विद्वांस्तपस्तप्त्वा न विस्मयेत् । नार्तोऽप्यभिभवेद् विप्रान् न दत्त्वा परिकीर्तयेत् ॥ विद्वान् पुरुष कभी झूठ न बोले, तपस्या करके उसपर गर्व न करे, कष्टमें पड़ जानेपर भी ब्राह्मणोंका अनादर न करे तथा दान देकर उसका बखान न करे ।।
यज्ञोऽनृतेन क्षरति तपः क्षरति विस्मयात् । आयुर्विप्रावमानेन दानं तु परिकीर्तनात् ॥ झूठ बोलनेसे यज्ञका क्षय होता है, गर्व करनेसे तपस्याका क्षय होता है, ब्राह्मणके अपमानसे आयुका और अपने मुँहसे बखान करनेपर दानका नाश हो जाता है ।।
एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रमीयते । एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेकश्चाप्नोति दुष्कृतम् ॥