भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2177, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2177

जीव अकेले जन्म लेता है, अकेले मरता है तथा अकेले ही पुण्यका फल भोगता है और अकेले ही पापका फल भोगता है ।।
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ ।
विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुवर्तते ।।
बन्धु-बान्धव मनुष्यके मरे हुए शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेके समान पृथ्वीपर डालकर मुँह फेरकर चल देते हैं। उस समय केवल धर्म ही जीवके पीछे-पीछे जाता है ।।
अनागतानि कार्याणि कर्तुं गणयते मनः ।
शारीरकं समुद्दिश्य स्मयते नूनमन्तकः ।।
तस्माद् धर्मसहायस्तु धर्मं संचिनुयात् सदा ।
धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ।।
मनुष्यका मन भविष्यके कार्योंको करनेका हिसाब लगाया करता है, किंतु काल उसके नाशवान् शरीरको लक्ष्य करके मुसकराता रहता है; इसलिये धर्मको ही सहायक मानकर सदा उसीके संग्रहमें लगे रहना चाहिये; क्योंकि धर्मकी सहायतासे मनुष्य दुस्तर नरकके पार हो जाता है ।।
येषां तडागानि बहूदकानि
सभाश्च कूपाश्च शुभाः प्रपाश्च ।
अन्नप्रदानं मधुरा च वाणी
यमस्य ते निर्विषया भवन्ति ।।
जिन्होंने अधिक जलसे भरे हुए अनेक सरोवर, धर्मशालाएँ, कुएँ और सुन्दर पौंसले बनवाये हैं तथा जो सदा अन्नका दान करते हैं और मीठी वाणी बोलते हैं, उनपर यमराजका जोर नहीं चलता ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)